NATIONAL : गांधी परिवार ने क्‍यों बनाई वक्‍फ बिल से दूरी और मोदी सरकार को घेरने का मौका खो दिया?

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क्या यह मान लिया जाए कि कांग्रेस की नीतियां अल्पसंख्यकों को लेकर बदल रही हैं ? या कांग्रेस बीजेपी को मात देने की कोई नई रणनीति बना रही है. कुछ तो जरूर है वरना गांधी फैमिली इस महत्वपूर्ण विषय को यूं ही यह जाया नहीं करती.

गांधी परिवार के तीन सांसद इस समय संसद में हैं . पर आश्चर्यजनक है कि वक्फ बोर्ड पर सरकार को घेरने के मौके को परिवार ने गंभीरता से नहीं लिया. देश के इस महत्वपूर्ण विषय पर परिवार एक भी सदस्य लोकसभा या राज्यसभा में देश के मुसलमानों की आवाज नहीं बना. यह दो तरीके से कांग्रेस के लिए बेहद शर्मिदगी का विषय़ है. पहला देश के एक महत्वपूर्ण मामले से खुद को गांधी परिवार ने अलग रखा. दूसरा, खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले दलों ने जब पूरी ताकत से संसद में विरोध किया इस परिवार ने अपना मुंह बंद कर लिया.

पर ऐसा नहीं है कि वक्फ बोर्ड संशोधन अधिनियम का विरोध कांग्रेस ने नहीं किया. कांग्रेस के प्रवक्ता अपना गला फाड़कर टीवी चैलनों पर बहस में शामिल हो रहे हैं. कांग्रेस सांसदों ने दोनों ही सदनों में विधेयक के विरोध में वोटिंग किया. कांग्रेस के तमाम मुस्लिम सांसदों ने अपने तर्कों के बौंछार से सरकार को घेरने की हर कोशिश की. इमरान प्रतापगढ़ी का स्पीच तो वायरल भी हो गया है. पर कांग्रेस के बड़े नेता इस संबंध में अपना मुंह संसद में नहीं खोले. वक्फ बोर्ड संशोधन अधिनियम पर बोलते हुए कांग्रेस की एक बैठक में सोनिया गांधी ने कहा कि सरकार ने जबरन यह बिल पास कराया है . पर सवाल उठता है कि जब कांग्रेस के बड़े नेताओं ने वक्फ बिल पर बोलने की जहमत ही नहीं उठाई तो फिर सरकार को क्यों दोष दे रहे हैं? क्या कांग्रेस अपने पुछल्ले नेताओं के भरोसे वक्फ बोर्ड संशोधन बिल को रोकना चाहती थी?

सवाल यह भी उठता है कि क्या यह मान लिया जाए कि कांग्रेस की नीतियां अल्पसंख्यकों को लेकर बदल रही हैं ? या कांग्रेस बीजेपी को मात देने की कोई नई रणनीति बना रही है. कुछ तो जरूर है वरना कांग्रेस इस महत्वपूर्ण विषय को यूं ही जाया नहीं करती. आइये देखते हैं कि गांधी परिवार के इस महत्वपूर्ण अवसर को गंवाने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं ?

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि बीजेपी को हराने की नई रणनीति पर आजकल कांग्रेस काम कर रही है. इसी रणनीति के तहत दिल्ली में आम आदमी पार्टी से अलग हो कर पार्टी ने चुनाव लड़ा . बहुत उम्मीद है कि बिहार में भी पार्टी आरजेडी से अलग हो कर ही चुनाव लड़े. पार्टी को यह बात समझ में आ गई है कि जब तक हम अपने पुराने वोट बैंक को फिर से पा नहीं जाएंगे पार्टी का भला नहीं हो सकता है. बिहार में भी जिस तरह पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस ने आरजेडी को अवॉयड किया है यह उसी रणनीति का हिस्सा है. दिल्ली और बिहार में इंडिया गुट के दलों से दूरी बनाने का यही कारण है क्योंकि आम आदमी पार्टी हो या आरजेडी दोनों ही दल कांग्रेस के वोट बैंक पर कब्जा करके इन राज्यों में कांग्रेस को ज्ञान देते रहते हैं. कांग्रेस ने सोच लिया है कि जब तक दिल्ली, यूपी, बिहार आदि राज्यों में जिन दलों ने उनके वोट बैंक पर कब्जा किया है उन्हें खत्म नहीं किया जाता पार्टी की जीत मुश्किल है.

इसी तरह कांग्रेस को लगता है कि सवर्ण हिंदू विशेषकर ब्राह्मणों के वोट को जब तक कांग्रेस फिर से अपने साथ नहीं ला सकेगी तब तक बीजेपी को हराना मुश्किल है. यही सोचते हुए वक्फ बिल का कांग्रेस ने विरोध तो किया पर बड़े लेवल पर नहीं किया. वक्फ बिल संसद में पेश होने के दिन तक कांग्रेस का अधिकारिक ट्वीटर हैंडल हो या राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन ख़ड़गे का हैंडल इस बिल को लेकर बिल्कुल शांत थे. राहुल गांधी दुनिया भर के तमाम विषयों पर अपनी चिंता जाहिर करते हैं पर वक्फ बिल पर कुछ नहीं बोलते हैं. हालांकि जिस दिन बिल पेश हुआ उस दिन उन्होंने जरूर एक ट्वीट इस संबंध में किया है . अन्यथा पूरा गांधी परिवार इस बिल को या तो समझ नहीं रहा था या जानबूझकर इससे दूरी बरत रहा था.

कांग्रेस पर इंडिया गुट के उनके साथी केरल के मुख्यमंत्री पिनराय विजयन का आरोप रहा है कि सीएए का विरोध कांग्रेस ने ठीक तरीके से नहीं किया. विजयन केरल विधानसभा चुनावों के दौरान कहते थे कि राहुल गांधी अपने न्याय यात्रा के दौरान एक बार भी सीएए के विरोध में नहीं बोले. विजयन का कहना था कि जिस तरह सीएए के खिलाफ केरल सरकार ने विधानसभा से एक प्रस्ताव पेश किया उस तरह का प्रस्ताव तत्कालीन राजस्थान-मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकारों ने नहीं किया.

विजयन की बातों में दम था. कांग्रस ने कभी सीएए का विरोध उस लेवल पर जा कर नहीं किया जिस तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कर रहे थे. ठीक उसी तरह आज वक्फ बोर्ड संशोधन बिल का विरोध अखिलेश यादव और ममता बनर्जी जिस तरह कर रहे हैं उस तरह का विरोध कांग्रेस के बड़े नेताओं द्वारा नहीं किया गया. कांग्रेस नेताओं राहुल गांधी, प्रियंका गांधी , सोनिया गांधी का संसद में बहस में भाग लेने तक की ही बात नहीं है. ये लोग अपने ट्वीटर हैंडल या अन्य तरीकों से भी वक्फ बोर्ड संशोधन का विरोध नहीं किया. कितनी अजीब बात है कि जब देश में वक्फ बिल की बात हो रही है तो सोनिया गांधी शिक्षा पर ऑर्टिकल लिख रही है. राहुल गांधी को चीन और ट्रंप का टैरिफ अत्याचार नजर आ रहा है. प्रियंका गांधी को गाजा में मरते हुए लोग दिख रहे हैं.

कांग्रेस पर आरोप रहा है कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर यहां फैसले जल्दी नहीं लिए जाते. इंडिया गठबंधन को लेकर कांग्रेस के सुस्त रवैयै के चलते ही नीतीश कुमार के अलग होने की नौबत आ गई थी . जिसकी कमी आज तक गठबंधन पूरा नहीं कर सका. सीट शेयरिंग को लेकर यूपी में समाजवादी पार्टी के साथ तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी के साथ बहुत मचमच हो चुका है.अरविंद केजरीवाल को भी लेकर पार्टी कई बार उधेड़बुन में रही है. पंजाब में विधानसभा चुनावों के समय अमरिंदर सिंह को लेकर क्या करना है ये जब तक गांधी परिवार सोचता तब तक गंगा से बहुत पानी बह चुका था. अरविंद केजरीवाल को लेकर भी इसी तरह की रवैया कांग्रेस का रहा. भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समय उन्हें कांग्रेस ने इन्वाइट नहीं किया. बाद में उनसे लोकसा चुनावों के दौरान गठबंधन भी कर लिया. इसी तरह कई मौकों पर कांग्रेस जब तक फैसला करती है ट्रेन लेट हो जाया करती है. शायद कुछ ऐसा ही इस बार हुआ है. वक्फ बोर्ड संशोधन बिल को करना क्या है ये कांग्रेस अभी तक समझ नहीं पाई है.

कांग्रेस विरोधियों का कहना है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी किसी जटिल विषय को लेकर बचते है. वक्फ बोर्ड संशोधन कानून के बारे में भी ऐसा ही कुछ है. राहुल गांधी और प्रियंका को टाइम ही नहीं मिल सका कि वह इस बिल के बारे में ठीक से अध्ययन कर सकें. संभावना है कि इसलिए दोनों ने इससे दूरी बनाना ही बेहतर समझा.

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