बिहार को बुधवार (15 अप्रैल) को नया मुख्यमंत्री मिलेगा। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और सीएम पद से इस्तीफा दिए जाने के बाद भाजपा विधायक दल की बैठक में सम्राट चौधरी को मंगलवार को नेता चुना गया। बिहार के डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने इस बैठक में उनके नाम का प्रस्ताव रखा। कुशवाहा जाति से ताल्लुक रखने वाले सम्राट चौधरी दिग्गज नेता शकुनी चौधरी के बेटे हैं।
कौन हैं सम्राट चौधरी?
16 नवंबर, 1968 में जन्मे सम्राट चौधरी बिहार के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। सम्राट के पिता शकुनी चौधरी अलग-अलग पार्टियों से कई बार विधायक, सांसद और मंत्री रहे हैं। समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शकुनी चौधरी भी एक हैं। बिहार में कुशवाहा समाज के बड़े नेताओं में शकुनी चौधरी शुमार किए जाते हैं। अब सम्राट चौधरी अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
साल 1990 में सक्रिय राजनीति में उतरने वाले सम्राट चौधरी ने अपने करियर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से की थी। हालांकि, बाद में वे जदयू से होते हुए हम और भाजपा तक आए। एक तरह से देखा जाए तो सम्राट चौधरी का चुनावी और राजनीतिक सफर बेहद उतार-चढ़ाव वाला और कई दलों से जुड़ा रहा है। आखिरकार इन बदलावों के बाद अब वे बिहार के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं।

- शुरुआती राजनीतिक दौर और राजद में भूमिका
उन्होंने 1990 में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और शुरुआती दिनों में समता पार्टी से भी जुड़े रहे। मई 1999 में वे राबड़ी देवी की राजद सरकार में कृषि मंत्री बने, लेकिन कम उम्र से जुड़े विवाद के कारण उन्हें उस पद से इस्तीफा देना पड़ा।
2000: चुनाव में मिली पहली जीत
साल 2000 में हुए विधानसभा चुनाव में बिहार में बहुत कुछ बदल चुका था। राज्य की सत्ता पर काबिज पार्टी का नाम और मुख्यमंत्री भी बदल चुका था। उस दौर में बिहार के सबसे कद्दावर नेता लालू प्रसाद यादव घोटाले के आरोप में जेल आ जा रहे थे। उनकी जगह उनकी पत्नी राबड़ी देवी राज्य की सत्ता पर काबिज थीं। इन सबके बीच हुए चुनाव में परबत्ता सीट पर लालू की राजद से राकेश कुमार (सम्राट चौधरी) ने जीत दर्ज की। सम्राट चौधरी ने निर्दलीय चुनाव लड़ रहे रामानंद प्रसाद सिंह को 12,777 वोट से हरा दिया था। इस तरह वे राजद के टिकट पर जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे। हालांकि, एक बार फिर उनकी उम्र को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद उनका निर्वाचन रद्द कर दिया गया।
2004: नहीं कायम रख पाए परबत्ता की सीट
2004 में राकेश कुमार का निर्वाचन रद्द होने के बाद परबत्ता सीट पर उपचुनाव कराए गए। उप चुनाव में जदयू के रामानंद प्रसाद सिंह ने राजद के राकेश कुमार यानी सम्राट चौधरी को 11,134 वोट से हरा दिया।
2005: एक ही साल में लगातार दो हार
2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। पहली बार फरवरी में और दूसरी बार अक्तूबर में राज्य की जनता ने वोट डाला। बिहार में ऐसा पहली बार हुआ था जब एक ही साल में दो बार चुनाव हुए थे। फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में जदयू के रामानंद प्रसाद सिंह ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने राजद के राकेश कुमार यानी सम्राट चौधरी को 1,918 वोट से हराया था।
इसके बाद अक्तूबर में नए सिरे से हुए चुनाव में भी परबत्ता सीट से रामानंद प्रसाद ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की। एक बार फिर उन्होंने पूर्व विधायक राकेश कुमार उर्फ सम्राट चौधरी को हराया। हालांकि, इस बार राकेश कुमार राजद के टिकट पर नहीं बल्कि निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे।
- फिर शुरू हुआ जदयू में सफर
साल 2014 में उन्होंने राजद के 13 विधायकों को अलग कर जदयू में शामिल होने की रणनीति बनाई। इसके बाद 2014 में ही जीतन राम मांझी की सरकार में उन्हें नगर विकास और आवास मंत्री बनाया गया। 2015 में जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार बगावत की। मांझी ने जब हम बनाई तो सम्राट के पिता शकुनी चौधरी भी इसके सक्रिय सदस्य बने। यहां तक की हम के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान सम्राट पर हम के कार्यक्रमों में भाग लेने। 2015 के विधानसभा चुनाव में हम उम्मीदवार पिता और भाई के लिए प्रचार करने का आरोप लगा। मामला विधान परिषद तक पहुंचा। यहां तक कि जनवरी 2016 में उनकी विधान परिषद सदस्यता रद्द कर दी गई। जबकि उनका कार्यकाल 23 मई 2020 तक का था।
- भाजपा में सफर और विधान परिषद सदस्य
जून 2017 में सम्राट चौधरी भाजपा में शामिल हो गए और 2018 में पार्टी की बिहार इकाई के प्रदेश उपाध्यक्ष बने। 2020 में वे बिहार विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) चुने गए और 2021 में एनडीए सरकार में पंचायती राज मंत्री बने।
- प्रमुख पदों पर नियुक्ति
2022 में उन्हें बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष चुना गया। इसके बाद, मार्च 2023 में उन्हें बिहार भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जिस पद पर वे 26 जुलाई 2024 तक रहे।
- भाजपा और जदयू के साथ आने के बाद बने उपमुख्यमंत्री
जनवरी 2024 में जब नीतीश कुमार ने एनडीए में वापसी की, तो सम्राट चौधरी को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाया गया और उन्हें वित्त व स्वास्थ्य जैसे कई महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए।
2025 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने तारापुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और राजद के प्रत्याशी अरुण कुमार को 45,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराया। 2025 में एनडीए की जीत के बाद वे फिर से भाजपा विधायक दल के नेता चुने गए और उन्हें लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ बिहार का गृह मंत्री भी बनाया गया।
उस जीत के महज एक साल बाद ही नीतीश कुमार अब बिहार के मुख्यमंत्री पद से दूर राज्यसभा जा चुके हैं। इसी के साथ भाजपा ने अब इस राज्य की कमान सम्राट चौधरी को सौंपी है।
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरणों की बहुत अहमियत है। सम्राट चौधरी कुशवाहा जाति से ताल्लुक रखते हैं और बिहार में इस जाति का आधार करीब 7-9 प्रतिशत है। बिहार में यादव जाति के बाद सबसे ज्यादा वोटर कुशवाहा जाति के ही हैं। बिहार में हुए जातीय सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग 27 प्रतिशत, अति-पिछड़ा वर्ग 36 प्रतिशत है, जो राज्य की कुल आबादी का 63 प्रतिशत हो जाते हैं। यही वजह है कि बिहार की जातीय राजनीति को साधने में सम्राट कुशवाहा भाजपा के लिए अहम हैं।


