पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि अभी महंगा कच्चा तेल प्रोसेस हो रहा है। जानिए पेट्रोल-डीजल की कीमतें कब कम हो सकती हैं और तेल कंपनियों को कितना नुकसान हुआ। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें कब कम होंगी? यह सवाल इन दिनों करोड़ों लोगों के मन में है। इस बीच केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि फिलहाल ईंधन की कीमतों में कटौती को लेकर कोई फैसला नहीं लिया जा सकता। अगले 2 से 3 महीनों में स्थिति की समीक्षा के बाद ही राहत मिलने की संभावना पर निर्णय होगा।
आलिया भट्ट का सबसे बड़ा एक्शन अवतार, लेकिन क्या YRF Spy Universe की नई फिल्म उम्मीदों पर खरी उतरी? मंत्री ने बताया कि ईरान संकट के दौरान भारतीय तेल कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार से काफी महंगा कच्चा तेल खरीदा था। फिलहाल रिफाइनरियां उसी स्टॉक को प्रोसेस कर रही हैं, इसलिए कीमतों में तुरंत कमी करना संभव नहीं है। Also Read – EPFO New Rules 2026: अब ₹1,800 तक ही अनिवार्य PF योगदान, 12% अतिरिक्त कटौती होगी स्वैच्छिक महंगा कच्चा तेल बना सबसे बड़ी वजह हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक, जब ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं, तब भारतीय तेल कंपनियों को भी ऊंची कीमत पर क्रूड ऑयल खरीदना पड़ा। Also Read – स्मॉल सेविंग्स ब्याज दरें अपडेट: PPF पर 7.1% और सुकन्या पर 8.2% ब्याज; लगातार 10वीं तिमाही में नहीं हुआ कोई बदलाव अब जबकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम फिर नीचे आने लगे हैं, तब भी पुराने महंगे स्टॉक का असर बना हुआ है।

यही वजह है कि सरकारी कंपनियां फिलहाल ईंधन के दाम घटाने की स्थिति में नहीं हैं। इधर, दिल्ली सरकार ने एक जुलाई 2026 से नई EV पालिसी लागू की है। नई EV नीति के अनुसार 1 अप्रैल 2028 से दिल्ली में नए पेट्रोल और CNG दोपहिया वाहनों का पंजीकरण नहीं किया जाएगा। इसके बाद केवल नए इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों का ही रजिस्ट्रेशन होगा। Also Read – PF निकासी के नियमों में बड़ा बदलाव: अब 25% बैलेंस रखना होगा; ₹1 लाख में सिर्फ ₹75 हजार निकाल सकेंगे 2-3 महीने बाद मिल सकती है राहत पेट्रोलियम मंत्री ने कहा कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अगले दो से तीन महीनों तक इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो भविष्य में पेट्रोल और डीजल के दामों में राहत मिलने की संभावना बन सकती है। उन्होंने कहा कि फिलहाल बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और भविष्य का फैसला वैश्विक कीमतों के आधार पर लिया जाएगा।
सरकारी तेल कंपनियों को हुआ बड़ा नुकसान सरकार के अनुसार, लागत से कम कीमत पर ईंधन उपलब्ध कराने के कारण सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को 30 जून तक कुल ₹74,781 करोड़ का नुकसान (अंडर-रिकवरी) उठाना पड़ा है। मंत्री ने बताया कि अप्रैल से जून की अवधि में पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी की बिक्री पर कंपनियों को भारी वित्तीय दबाव झेलना पड़ा। पिछली तिमाहियों के नुकसान को जोड़ने पर यह बोझ और भी बढ़ गया है। मई में बढ़ाए गए थे पेट्रोल-डीजल के दाम मई 2026 में इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे क्रूड ऑयल का हवाला देते हुए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चरणबद्ध तरीके से ₹7.50 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की थी। देश के 90 प्रतिशत से अधिक पेट्रोल पंप इन्हीं तीन सरकारी कंपनियों के नियंत्रण में हैं। फिलहाल इन कंपनियों ने कीमतों में कोई नई कटौती नहीं की है। प्राइवेट कंपनी ने घटाए पेट्रोल-डीजल के दाम सरकारी कंपनियों के विपरीत, निजी ईंधन रिटेलर नायरा एनर्जी ने हाल ही में पेट्रोल पर ₹5 प्रति लीटर और डीजल पर ₹3 प्रति लीटर की कटौती की है। भोपाल में नायरा के पेट्रोल की कीमत घटकर ₹114.79 प्रति लीटर और डीजल ₹99.57 प्रति लीटर हो गया है। इससे निजी कंपनियों और सरकारी कंपनियों के दामों में अंतर भी बढ़ गया है। कच्चे तेल की कीमतों में क्या बदलाव आया? मंत्री के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पहले लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल थीं।
युद्ध के दौरान यह बढ़कर करीब 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। अब वैश्विक हालात सामान्य होने और तनाव कम होने के बाद कीमतें फिर लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई हैं। यदि यह गिरावट स्थिर रहती है तो आने वाले महीनों में भारतीय उपभोक्ताओं को भी राहत मिल सकती है। क्या होती है अंडर-रिकवरी? जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं, लेकिन सरकार या तेल कंपनियां आम लोगों को राहत देने के लिए उसी अनुपात में पेट्रोल, डीजल या एलपीजी की कीमतें नहीं बढ़ातीं, तब लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर अंडर-रिकवरी कहलाता है। यही अंतर तेल कंपनियों के वित्तीय नुकसान का कारण बनता है। लंबे समय तक अंडर-रिकवरी बढ़ने पर कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ जाता है और भविष्य में कीमतों की समीक्षा की जरूरत पड़ती है। आम उपभोक्ताओं के लिए इसका क्या मतलब है? फिलहाल सरकारी तेल कंपनियों से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल राहत मिलने की संभावना कम दिखाई दे रही है। हालांकि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता बना रहता है और महंगा स्टॉक खत्म हो जाता है, तो अगले कुछ महीनों में ईंधन की कीमतों में कटौती की उम्मीद की जा सकती है।

