विदेश मंत्री एस जयशंकर फ्रांस, बेल्जियम और यूरोपीय यूनियन की यात्रा पर जा रहे हैं. यह दौरा भारत की सुरक्षा नीति, रक्षा साझेदारी और पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद पर चर्चा के लिए महत्वपूर्ण है.
विदेश मंत्री एस जयशंकर अगले सप्ताह फ्रांस, बेल्जियम और यूरोपीय यूनियन की यात्रा पर जा रहे हैं. यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब एक तरफ भारत की सुरक्षा नीति में यूरोप की भूमिका लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर भारत-पाक तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिर से आवाजें उठने लगी हैं. जयशंकर की यह यात्रा सामान्य कूटनीतिक संवाद से कहीं ज्यादा रणनीतिक संदेशों से भरी मानी जा रही है. आखिरकार, यही वो क्षेत्र है जहां से भारत को अत्याधुनिक राफेल लड़ाकू विमान मिले, और अब, जब भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत कर रहा है, तो यूरोप के साथ संवाद नई ऊंचाई छू सकता है.
विदेश मंत्रालय के अनुसार, डॉ. जयशंकर की यह यात्रा तीन हिस्सों में बंटी होगी. फ्रांस, जहां रक्षा सहयोग, इंडो-पैसिफिक रणनीति और संयुक्त परियोजनाओं पर चर्चा होगी. बेल्जियम, यूरोपीय यूनियन के संस्थानों का केंद्र, वहां जहां व्यापार, निवेश और सुरक्षा पर बातचीत होगी. भारत-EU साझेदारी को नई ऊर्जा देने के लिए यूरोपीय यूनियन से चर्चा होगी.

क्या है पाकिस्तान एंगल?
दिलचस्प यह है कि कुछ दिन पहले ही एक भारत का सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल अमेरिका और यूरोप के कई देशों में गया था, जहां उन्होंने पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को प्रायोजित करने के सबूत साझा किए थे. अब, जयशंकर खुद इन देशों से संवाद करने जा रहे हैं, जो भारत की कूटनीतिक ‘फॉलोअप’ रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है.
ORF के विदेश नीति मामलों के जानकार विनय कौशिक ने लिखा, जयशंकर की यह यात्रा एक साथ कई संदेश देती है. एक ओर यह भारत की रक्षा साझेदारियों को मजबूती देने का संकेत है, दूसरी ओर यह पाकिस्तान को यह जताने की कोशिश है कि भारत अब वैश्विक मंचों पर सीधे जवाब देगा. इस दौरान फ्रांस के नीस शहर में संयुक्त राष्ट्र की Oceans Conference भी हो रही है, जिसमें भारत की ओर से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह भाग लेंगे. यह दर्शाता है कि भारत समुद्री सुरक्षा और जलवायु-संबंधी चुनौतियों पर भी सक्रिय कूटनीति अपना रहा है.
फ्रांस से भारत की ‘डिफेंस केमिस्ट्री’
राफेल सौदे के बाद से भारत और फ्रांस के बीच रक्षा क्षेत्र में संबंध और गहरे हुए हैं. नौसेना सहयोग, संयुक्त युद्धाभ्यास (जैसे ‘वैरुण’) और अब भारत में डिफेंस प्रोडक्शन, यह सब फ्रांस को भारत का एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार बनाते हैं. भारत को यूरोप में फ्रांस जैसा साथी इसलिए भी चाहिए क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच जब तनाव बढ़ता है, तो यूरोप एक संतुलनकारी ताकत बन सकता है. जयशंकर की यूरोप यात्रा को सिर्फ एक डिप्लोमैटिक दौरा मानना भूल होगी. यह भारत की स्मार्ट स्ट्रैटेजी का हिस्सा है, जिसमें रक्षा, आतंकवाद, व्यापार और समुद्री सुरक्षा, सब कुछ एक एजेंडे में समाहित है. और यह संदेश साफ है, भारत अब अपने हितों के लिए कूटनीतिक आक्रामकता अपनाने को तैयार है.

