NATIONAL : थरूर बोले- RSS की मूल विचारधारा अब भी वही, लेकिन भागवत के बयानों में दिख रहा बदलाव

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कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा को लेकर कहा है कि संगठन का मूल उद्देश्य भारत को हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व की दिशा में आगे बढ़ाना है और इस विचार में अब तक कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। हालांकि, उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयानों को सकारात्मक संकेत बताते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में उनके बोलने के तरीके और नई पीढ़ी को लेकर उनके नजरिए में बदलाव दिखाई देता है।

थरूर ने यह बात मुंबई में आयोजित इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (IIMUN) के कार्यक्रम में कही। इसी कार्यक्रम में मोहन भागवत ने Gen-Z और Gen-Alpha के युवाओं से बातचीत की थी। भागवत ने युवाओं को लेकर कहा था कि नई पीढ़ी को केवल निर्देश देने के बजाय उनकी बात सुनी जानी चाहिए और उनसे संवाद किया जाना जरूरी है।

थरूर ने कहा कि वह करीब एक दशक से संघ प्रमुख के बयानों पर नजर रखते आए हैं। उनके मुताबिक, भागवत के हालिया वक्तव्यों में संवाद और नई पीढ़ी को समझने पर जिस तरह जोर दिया जा रहा है, वह पहले के मुकाबले अलग दिखाई देता है। हालांकि थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि इसे RSS की मूल विचारधारा में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी संगठन की विचारधारा और उसके नेताओं के संवाद के तरीके में अंतर हो सकता है। उनके अनुसार, RSS का हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र से जुड़ा मूल नजरिया अभी भी मौजूद है, लेकिन भागवत जिस तरह युवाओं के सवालों को सुनने और उनसे बातचीत करने की बात कर रहे हैं, वह लोकतांत्रिक संवाद के लिहाज से एक अच्छा संकेत है।

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थरूर ने अलग-अलग विचारधारा वाले लोगों के साथ बातचीत को भी जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि किसी कार्यक्रम में किसी ऐसे व्यक्ति के साथ मंच साझा करना, जिसकी विचारधारा अलग है, इसका मतलब यह नहीं कि दोनों के विचार एक हो गए। लोकतंत्र में असहमति के बावजूद बातचीत की गुंजाइश बनी रहनी चाहिए। उन्होंने उन लोगों पर भी प्रतिक्रिया दी जो भागवत के साथ एक ही मंच पर जाने को लेकर उनकी आलोचना कर रहे हैं।

कांग्रेस सांसद ने बदलती राजनीति में युवाओं की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में Gen-Z देश का सबसे बड़ा वोटिंग समूह बनने जा रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए युवा मतदाताओं के सवालों और उनकी अपेक्षाओं को समझना जरूरी होगा। उनका कहना था कि राजनीति पुराने तौर-तरीकों के सहारे लंबे समय तक नहीं चल सकती।

थरूर ने कहा कि दक्षिण एशिया की राजनीतिक पार्टियों को भी बदलते समय के साथ अपनी कार्यशैली में बदलाव करना होगा। युवा अब सवाल पूछते हैं, जानकारी हासिल करते हैं और राजनीतिक दलों से सीधे जवाब चाहते हैं। ऐसे में केवल भाषण देने या आदेश देने के बजाय संवाद की जरूरत है।

उन्होंने कांग्रेस के भीतर अपनी स्थिति को लेकर भी बात रखी। थरूर ने कहा कि वह ऐसी पार्टी का हिस्सा हैं जिसकी विचारधारा उन्हें अपने विचारों के सबसे करीब लगती है। उन्होंने कांग्रेस को लोकतांत्रिक ढांचे में असहमति की गुंजाइश रखने वाली पार्टी बताया। उनका कहना था कि राजनीतिक दल के भीतर अलग राय रखना लोकतंत्र का हिस्सा है।

युवा आंदोलनों और राजनीतिक दलों की भूमिका पर भी थरूर ने आत्ममंथन की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि कई बार राजनीतिक दल किसी मुद्दे को उठाते हैं, लेकिन उन्हें जनता से वैसा समर्थन नहीं मिल पाता जैसा बाद में किसी आंदोलन को मिल जाता है। ऐसे मामलों में सिर्फ जनता को दोष देने के बजाय राजनीतिक दलों को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि उनके संदेश और लोगों की वास्तविक चिंताओं के बीच दूरी कहां रह गई।

थरूर ने यह भी कहा कि कांग्रेस को लोगों की नब्ज बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है। युवाओं के बीच बेरोजगारी, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और अवसर जैसे मुद्दे लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। राजनीतिक दल अगर इन सवालों पर युवाओं से सीधे संवाद नहीं करेंगे तो उनके लिए नई पीढ़ी से जुड़ना मुश्किल हो सकता है।

इससे पहले मोहन भागवत ने युवाओं से संवाद के दौरान Gen-Z को लेकर कहा था कि नई पीढ़ी को एंटी-नेशनल समझना सही नहीं है। उन्होंने कहा था कि जब उनकी पीढ़ी Gen-Z की उम्र में थी, तब बड़े लोगों की बात को आम तौर पर मान लिया जाता था और सवाल कम पूछे जाते थे। आज की पीढ़ी सवाल करती है और अपनी बात खुलकर रखना चाहती है।

भागवत ने यह भी कहा था कि नई पीढ़ी से आदेश के रूप में बात करने के बजाय संवाद किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, अगर युवाओं से बातचीत नहीं होगी तो उनके भीतर मौजूद सवाल और असंतोष अलग-अलग रूपों में सामने आ सकते हैं।

थरूर की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब राजनीतिक दलों के लिए युवा मतदाता लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन राजनीतिक संवाद ने युवाओं की भागीदारी का तरीका भी बदल दिया है। ऐसे माहौल में RSS और कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक संगठनों के सामने चुनौती यही है कि वे नई पीढ़ी के सवालों को किस तरह समझते और उनका जवाब देते हैं।

थरूर ने भागवत के बयान को इसी बदलते राजनीतिक माहौल में एक संकेत के तौर पर देखा है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि संवाद की भाषा में बदलाव को RSS की मूल विचारधारा में बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। उनके मुताबिक, असली सवाल यह है कि आने वाले समय में राजनीतिक संगठन युवाओं से कितनी गंभीरता से बातचीत करते हैं और उनके सवालों को अपनी राजनीति में कितनी जगह देते हैं।

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