देश में बीते पांच सालों में सरकारी स्कूल कम हुए हैं और प्राइवेट स्कूल बढ़े हैं। सरकारी स्कूलों में विद्यार्थी भी घटे हैं, लेकिन शिक्षकों की संख्या बढ़ी है। ये आंकड़े सरकार के हैं। ये आंकड़े शिक्षा की कैसी तस्वीर दिखाते हैं, डालते हैं एक नजर:
देश में कुल 14.67 लाख स्कूल हैं। इनमें से सरकारी स्कूलों की संख्या 10.05 लाख है। पढ़ने वाले कुल बच्चे 24.72 करोड़ हैं, लेकिन इनमें से लगभग आधे बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं। शिक्षकों की कुल संख्या 1.02 करोड़ है। यानि शिक्षक और बच्चों का अनुपात 1:24 का है। पांच साल में सरकारी स्कूलों की संख्या 26804 कम हो गई, जबकि इस बीच प्राइवेट स्कूल 936 बढ़ गए। बीते पांच सालों में शिक्षा जगत की तस्वीर कैसे बदली है, इसे इस टेबल में दिए आंकड़ों से समझा जा सकता है।
विवरण UDISE+ रिपोर्ट 2025-26 UDISE+ रिपोर्ट 2020-21
बिना सरकारी मदद वाले प्राइवेट स्कूलों की संख्या 3,41,689 3,40,753
बिना सरकारी मदद वाले प्राइवेट स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या 9,88,63,908 9,51,57,082
बिना सरकारी मदद वाले प्राइवेट स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 41,07,232 36,47,674
सरकारी स्कूलों की संख्या 10,05,245 10,32,049
सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या 11,89,03,585 13,49,04,560
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 51,34,623 49,27,099

शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ रिपोर्ट (2025-26) के मुताबिक देश में बिना सरकारी मदद के चलने वाले प्राइवेट स्कूलों की संख्या 341689 है। इनमें प्री-प्राइमरी से हायर सेकंडरी तक के 98863908 बच्चे पढ़ते हैं। इन बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों की संख्या 4107232 है।
सरकारी स्कूलों की बात की जाए तो इनकी संख्या 1005245 (केंद्र सरकार के 2194) है। इनमें 5134623 शिक्षक प्री-प्राइमरी से हायर सेकंडरी तक के 118903585 बच्चों को पढ़ाते हैं।
2020-21 की UDISE+ रिपोर्ट के मुताबिक बिना सरकारी मदद के, अपने दम पर चलने वाले प्राइवेट स्कूलों की संख्या 340753 थी। इनमें प्री-प्राइमरी से हायर सेकंडरी तक के 95157082 बच्चे थे। इन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों की संख्या 3647674 थी। पांच साल पहले प्राइमरी से हायर सेकंडरी तक पढ़ाने वाले सरकारी स्कूलों की संख्या 1032049 थी, जिनमें 4927099 शिक्षक और 134904560 बच्चे थे।
ये आंकड़े UDISE+ के हवाले से हैं। UDISE+ या Unified District Information System for Education Plus स्कूली शिक्षा व साक्षरता विभाग (DoSE&L) द्वारा सूकली शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी सभी जानकारी जुटाने और व्यवस्थित करने के लिए शुरू किया गया प्लैटफ़ार्म है।
सरकारी स्कूलों में 20 साल में करीब 20 प्रतिशत कम हुए बच्चे
कुछ साल पहले ‘स्टेट ऑफ द सेक्टर रिपोर्ट: प्राइवेट स्कूल्स इन इंडिया’ नाम से आई सेंटर स्क्वायर फ़ाउंडेशन की एक रिपोर्ट में Omidyar Network India की मैनेजिंग डाइरेक्टर रूपा कुदवा ने लिखा था कि केवल 20 वर्षों में भारत में सरकारी स्कूलों में जाने वाले बच्चों की संख्या 71 से गिर कर 52 प्रतिशत रह गई। उनका यह भी कहना था कि इनमें से करीब 40 फीसदी बच्चे कम आय वर्ग के हैं। यह आंकड़ा सीधे तौर पर सरकारी स्कूलों में लोगों के कम होते भरोसे को दिखाता है।
निजी स्कूलों को केवल एक फ़र्म ने दस साल में दिया 4200 करोड़ का लोन
निजी स्कूल खोलना देश में एक बड़ा कारोबार बनता जा रहा है। इनकी फीस सरकारी स्कूलों की तुलना में कई गुणा ज्यादा होती है, फिर भी मां-बाप अपने बच्चों के लिए इन्हीं को तरजीह देते हैं। 2013 में साउथ कैलिफोर्निया के स्टीव हार्डग्रेव ने अपने पुराने सहयोगी बजेश मिश्रा के साथ मिल कर वर्तना फ़ाइनेंस के नाम से बेंगलुरु में एक गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफ़सी) की शुरुआत की थी। इस फर्म का मकसद निजी स्कूल खोलने के लिए कर्ज उपलब्ध करवाना है। 2024 में हार्डग्रेव के हवाले से ‘द हिन्दू’ ने बताया था कि उनकी कंपनी भारत के 15 राज्यों में 13000 स्कूलों को 4200 करोड़ रुपये से ज्यादा का लोन दे चुकी थी। इनमें से 90 फीसदी स्कूल छोटे (टियर 2 और 3) शहरों में हैं। तब इनकी सालाना फीस 50000 रुपये से कम हुआ करती थी। निजी सेक्टर में ऐसे स्कूलों को ‘किफायती’ माना जाता है। जबकि, सरकारी स्कूलों की सालाना फीस दस हजार रुपये भी नहीं होती।
सरकारी स्कूलों में शिक्षक बढ्ने और बच्चों के घटने से छात्र-शिक्षक अनुपात (Pupil-teacher ratio या PTR) में सुधार जरूर हुआ है। 2018-19 में यह 27 हुआ करता था, जो अब 19 पर आ गया है। मतलब, प्रति शिक्षक छात्रों की औसत संख्या 19 है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में तय मानक के अनुसार यह संख्या 30 से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।

