NATIONAL : भारत से दक्षिण-पूर्व एशिया तक मौसम पैटर्न बदलने की आशंका; गर्मी, सूखा व अतिवृष्टि का खतरा

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प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने से मेगा अल नीनो की आशंका बढ़ी है। इसका असर भारत के मानसून, एशिया की बारिश, ऑस्ट्रेलिया के सूखे और वैश्विक तापमान पर पड़ सकता है। इससे कमजोर मानसून, लंबी लू और कृषि संकट जैसी चुनौतियां बढ़ने की संभावना जताई गई है।

प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि के संकेतों ने दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों का ध्यान फिर से मेगा अल नीनो की ओर खींचा है। विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ), अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) और भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार यदि अल नीनो की स्थिति और अधिक मजबूत होती है तो इसका असर भारत के मानसून, दक्षिण-पूर्व एशिया की वर्षा, ऑस्ट्रेलिया के सूखे, अफ्रीका की खाद्य सुरक्षा और अमेरिका-यूरोप के तापमान पैटर्न तक महसूस किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य अल नीनो और ‘मेगा अल नीनो’ यानी अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो में अंतर उसकी तीव्रता और वैश्विक प्रभाव के स्तर का होता है, और इतिहास बताता है कि ऐसे वर्षों में मौसमीय असंतुलन व्यापक आर्थिक और मानवीय संकट में बदल सकता है।

भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल दक्षिण-पश्चिम मानसून का है, क्योंकि देश की कृषि, जल भंडारण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। आईएमडी और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के वैज्ञानिकों के अनुसार मजबूत अल नीनो अक्सर मानसून को कमजोर कर सकता है, हालांकि हर बार इसका सीधा और समान असर नहीं होता।

कमजोर मानसून की स्थिति में धान, दाल, गन्ना और तिलहन जैसी फसलों पर दबाव बढ़ सकता है। जलाशयों का स्तर गिर सकता है और बिजली उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। साथ ही, उत्तर और मध्य भारत में लू की अवधि लंबी हो सकती है और शहरी क्षेत्रों में तापमान रिकॉर्ड स्तर तक जा सकता है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में इस समय अप्रैल के अंत से ही कई राज्यों में तापमान 44 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है और लू की अवधि सामान्य से लंबी देखी जा रही है। हर हीटवेव का सीधा कारण केवल अल नीनो नहीं होता, लेकिन मजबूत अल नीनो की पृष्ठभूमि में सतही तापमान और अधिक बढ़ सकता है। आईएमडी के अनुसार उत्तर-पश्चिम, मध्य और प्रायद्वीपीय भारत में लंबे और अधिक तीव्र गर्मी के दौर की संभावना ऐसे वर्षों में बढ़ जाती है।

दक्षिण-पूर्व एशिया में वर्षा संकट की आशंका: इंडोनेशिया, फिलीपींस, थाईलैंड, वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों में अल नीनो आमतौर पर वर्षा में कमी और लंबे शुष्क दौर का कारण बनता है।

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