NATIONAL : जंतर-मंतर प्रदर्शन पर सरकार का बड़ा बयान; छात्रों पर केस नहीं होगा, 2700 आरोपियों पर FIR रहेगी कायम

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जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि छात्रों के खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं होगी, लेकिन हिंसा और तोड़फोड़ में शामिल 2700 आरोपियों पर दर्ज एफआईआर वापस नहीं ली जाएगी। कोर्ट ने भी सख्ती बरतने वाले अधिकारियों को बचाने से इनकार किया।

जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने छात्रों को राहत देने वाला बड़ा बयान दिया। सरकार ने अदालत को बताया कि जिन छात्रों का प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा, आगजनी या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं से कोई संबंध नहीं पाया गया है, उनके खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। सरकार ने कहा कि निर्दोष छात्रों का भविष्य प्रभावित न हो, इसके लिए विशेष सावधानी बरती जाएगी।

जिन लोगों की पहचान हिंसा, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामलों में हुई है, उनके खिलाफ दर्ज लगभग 2700 एफआईआर को वापस नहीं लिया जाएगा। इन मामलों में जांच और कानूनी कार्रवाई पहले की तरह जारी रहेगी। सरकार का कहना है कि कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि जांच एजेंसियों ने सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल वीडियो, ड्रोन रिकॉर्डिंग और अन्य डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान की है। केवल उन्हीं लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई है, जिनकी भूमिका हिंसक घटनाओं में स्पष्ट रूप से सामने आई है। सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि किसी भी निर्दोष छात्र या नागरिक को बेवजह परेशान नहीं किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून सभी के लिए समान है। अदालत ने कहा कि यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी पुलिस अधिकारी या सुरक्षा बल के जवान ने आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया है या नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसे भी कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी को केवल उसके पद या वर्दी के आधार पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने जांच एजेंसियों को निर्देश दिया कि मामले की जांच पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से की जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ बिना पर्याप्त साक्ष्य के कार्रवाई न हो। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए दोषी और निर्दोष के बीच स्पष्ट अंतर होना जरूरी है।

सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि प्रदर्शन से जुड़े सभी डिजिटल साक्ष्यों की लगातार समीक्षा की जा रही है। यदि जांच के दौरान नए तथ्य सामने आते हैं तो उसी आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है और हिंसक गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।

इस मामले पर छात्र संगठनों ने सरकार के बयान का स्वागत किया है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को राहत मिलना सकारात्मक कदम है। हालांकि उन्होंने यह भी मांग की कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष हो और किसी भी निर्दोष छात्र को गलत तरीके से आरोपी न बनाया जाए।

सरकार के इस रुख से शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित होगा। इससे उन छात्रों को राहत मिलेगी जो केवल अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन में शामिल हुए थे, जबकि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तक संबंधित एजेंसियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अदालत अब जांच की प्रगति, दर्ज एफआईआर और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा करेगी।

जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने छात्रों को राहत देने वाला बड़ा बयान दिया। सरकार ने अदालत को बताया कि जिन छात्रों का प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा, आगजनी या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं से कोई संबंध नहीं पाया गया है, उनके खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। सरकार ने कहा कि निर्दोष छात्रों का भविष्य प्रभावित न हो, इसके लिए विशेष सावधानी बरती जाएगी।

जिन लोगों की पहचान हिंसा, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामलों में हुई है, उनके खिलाफ दर्ज लगभग 2700 एफआईआर को वापस नहीं लिया जाएगा। इन मामलों में जांच और कानूनी कार्रवाई पहले की तरह जारी रहेगी। सरकार का कहना है कि कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि जांच एजेंसियों ने सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल वीडियो, ड्रोन रिकॉर्डिंग और अन्य डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान की है। केवल उन्हीं लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई है, जिनकी भूमिका हिंसक घटनाओं में स्पष्ट रूप से सामने आई है। सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि किसी भी निर्दोष छात्र या नागरिक को बेवजह परेशान नहीं किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून सभी के लिए समान है। अदालत ने कहा कि यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी पुलिस अधिकारी या सुरक्षा बल के जवान ने आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया है या नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसे भी कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी को केवल उसके पद या वर्दी के आधार पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने जांच एजेंसियों को निर्देश दिया कि मामले की जांच पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से की जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ बिना पर्याप्त साक्ष्य के कार्रवाई न हो। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए दोषी और निर्दोष के बीच स्पष्ट अंतर होना जरूरी है।

सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि प्रदर्शन से जुड़े सभी डिजिटल साक्ष्यों की लगातार समीक्षा की जा रही है। यदि जांच के दौरान नए तथ्य सामने आते हैं तो उसी आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है और हिंसक गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।

इस मामले पर छात्र संगठनों ने सरकार के बयान का स्वागत किया है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को राहत मिलना सकारात्मक कदम है। हालांकि उन्होंने यह भी मांग की कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष हो और किसी भी निर्दोष छात्र को गलत तरीके से आरोपी न बनाया जाए।

सरकार के इस रुख से शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित होगा। इससे उन छात्रों को राहत मिलेगी जो केवल अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन में शामिल हुए थे, जबकि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तक संबंधित एजेंसियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अदालत अब जांच की प्रगति, दर्ज एफआईआर और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा करेगी।

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