पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में भारी धांधली और विरोध प्रदर्शनों के बीच इफ्तिखार अली गिलानी को नया प्रधानमंत्री चुना गया है. इसे लोकतंत्र का मजाक कहा जा रहा है क्योंकि गिलानी आम चुनाव में अपनी सीट हार गए थे. इसके बावजूद इस्लामाबाद और नवाज शरीफ के इशारे पर उन्हें ‘चोर दरवाजे’ से असेंबली में लाया गया और पीएम बना दिया गया. अपनी ही पार्टी PML-N के नेताओं और आम जनता के भारी विरोध के बीच बने इस ‘लूजर पीएम’ से पूरे PoK में गुस्सा बहुत बढ़ गया है.
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में लोकतंत्र के नाम पर एक बार फिर ऐसा सर्कस रचा गया है, जिसने पूरी दुनिया के सामने इस्लामाबाद का असली चेहरा बेनकाब कर दिया है. अब पीओके की जनता के सिर पर एक ‘लूजर पीएम’ बिठा दिया गया है. ये भारी विरोध प्रदर्शनों, खून-खराबे और धांधली के गंभीर आरोपों के बीच शुक्रवार को बैरिस्टर इफ्तिखार अली गिलानी को PoK का नया प्रधानमंत्री चुन लिया गया. इफ्तिखार गिलानी खुद अपनी सीट पर चुनाव हार गए थे लेकिन इसके बावजूद राजनीति खेलकर उन्हें पीओके का ‘लूजर कैंडिटेट’ को प्रधानमंत्री बना दिया.
जिसे PoK की जनता ने ठुकराया, उसी को बना दिया प्रधानमंत्री
पाकिस्तान की सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के इफ्तिखार गिलानी ने मुजफ्फराबाद स्थित तथाकथित विधानसभा में कुर्सी तो हासिल कर ली, लेकिन इस चुनाव की सबसे शर्मनाक सच्चाई ये है कि गिलानी खुद अपनी सीट पर चुनाव हार गए थे. जनता द्वारा पूरी तरह नकार दिए जाने के बाद भी इस्लामाबाद के आकाओं और नवाज शरीफ के इशारे पर उन्हें ‘चोर दरवाजे’ यानी टेक्नोक्रेट रिजर्व सीट से विधानसभा में घुसाया गया और अब वजीर-ए-आजम की कुर्सी पर बैठा दिया गया है. इस घटिया राजनीतिक खेल के बाद PoK की जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है और सड़कों पर दोबारा हिंसा भड़कने की आशंका तेज हो गई है.

इफ्तिखार गिलानी को क्यों कहा जा रहा है ‘लूजर पीएम’?
राजनैतिक विश्लेषकों और PoK की जनता की नजरों में बैरिस्तर इफ्तिखार अली गिलानी सिर्फ एक ‘कठपुतली’ ही नहीं, बल्कि पूरी तरह एक ‘लूजर पीएम’ हैं. इसके पीछे एक-दो नहीं, बल्कि कई ठोस कारण मौजूद हैं जो उनके राजनीतिक वजूद पर सवाल खड़े करते हैं.
जनता की अदालत में करारी हार: लोकतंत्र का पहला नियम होता है जनमत. तीन चरणों में, 27 जुलाई, 2 अगस्त और 3 अगस्त हुए आम चुनावों में PoK की जनता ने गिलानी को सीधे तौर पर वोट देने से मना कर दिया. वो अपनी सीधी चुनावी सीट से बुरी तरह हार गए. जब किसी नेता को उसके अपने इलाके की जनता खारिज कर देती है, तो उसे पूरे प्रदेश का नेतृत्व सौंपना सीधे-सीधे जनादेश का अपमान है.
‘चोर दरवाजे’ से असेंबली में एंट्री: चुनाव हारने के बाद अपनी साख बचाने और इस्लामाबाद की वफादारी भुनाने के लिए गिलानी ने शॉर्टकट रास्ता चुना. उन्हें महिलाओं, टेक्नोक्रेट्स और धर्मगुरुओं के लिए आरक्षित 8 सीटों में से एक ‘टेक्नोक्रेट सीट’ का सहारा देकर असेंबली में घुसाया गया. यानी वो जन-प्रतिनिधि नहीं, बल्कि मनोनित मोहरा बनकर सदन में पहुंचे.
बिना जनादेश का ‘डमी लीडर’: PoK की 53 सीटों वाली विधानसभा में 45 सीटों पर जनता सीधे वोट डालती है. गिलानी इनमें से एक भी सीट जीतने में नाकाम रहे. एक ऐसा नेता जिसके पास खुद का कोई वोट बैंक या जनादेश नहीं है, वो न तो स्वतंत्र फैसले ले सकता है और न ही जनता के हक में आवाज उठा सकता है. वो पूरी तरह से इस्लामाबाद में बैठे अपने आकाओं के इशारों पर नाचने को मजबूर रहेगा.
अपनी ही पार्टी में साख का संकट: गिलानी की नाकामी का आलम ये है कि उन्हें अपनी ही पार्टी का पूरा समर्थन हासिल नहीं है. PML-N के क्षेत्रीय अध्यक्ष शाह गुलाम कादिर ने इस फैसले का खुलकर विरोध किया और वोटिंग सेशन का बहिष्कार कर दिया. जो नेता अपनी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का भरोसा नहीं जीत पाया, वो ‘लूजर’ नहीं तो और क्या है?
मुजफ्फराबाद में बुलाई गई तथाकथित विधानसभा की बैठक में कुल 44 सदस्यों ने वोटिंग में हिस्सा लिया. इसमें इफ्तिखार गिलानी को 30 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मुख्तार अहमद को सिर्फ 14 वोटों से ही संतोष करना पड़ा.
वैसे तो PoK की इस तथाकथित विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं, लेकिन इस समय वहां केवल 46 सदस्य ही मौजूद हैं. पुंछ और सुधनोती जिलों की 7 सीटों पर चुनाव हिंसा और कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण टाल दिए गए थे. वोटिंग के दौरान पाकिस्तान का दोहरा चरित्र और पार्टी के अंदरूनी मतभेद भी खुलकर सामने आए
नवाज शरीफ का हुक्म: बृहस्पतिवार को ही PML-N के सुप्रीम लीडर नवाज शरीफ ने लाहौर से गिलानी के नाम पर मुहर लगा दी थी, जिसके बाद मुजफ्फराबाद में सिर्फ नाटक होना बाकी थाअपनों का ही बहिष्कार: PML-N के क्षेत्रीय अध्यक्ष शाह गुलाम कादिर अपनी ही पार्टी के इस फैसले से इतने नाराज हुए कि वो वोटिंग सेशन में शामिल ही नहीं हुए.
PoK में हुए इस चुनाव का इतिहास किसी प्रहसन से कम नहीं है. कुल 53 सीटों वाले इस ढांचे में 45 सीटों पर जनता सीधे वोट डालती है, जबकि 8 सीटें रिजर्व होती हैं. अब तक हुई 38 डायरेक्ट सीटों की गिनती में PML-N को 25 और PPP को 12 सीटें मिली हैं, जबकि एक सीट अवामी दस्त-ओ-बाजू पार्टी ने जीती और PML-N को समर्थन दे दिया.
आरक्षित 8 सीटों में से भी 6 सीटें फर्जी तरीके से PML-N को ही दे दी गईं. यानी जिस नेता को सीधे चुनाव में जनता ने पूरी तरह बाहर कर दिया था, उसे ही रिजर्व सीट के जरिए जबरन वजीर-ए-आजम बनाकर जनता के सिर पर लाद दिया गया.
जून से जल रहा है PoK: ‘जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ का भड़का गुस्सा
PoK की जनता सालों से इस्लामाबाद के जुल्मों, आसमान छूती महंगाई, भारी-भरकम बिजली बिलों और पाकिस्तानी सेना की तानाशाही से तंग आ चुकी है. जून की शुरुआत से ही ‘जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ के बैनर तले हजारों लोग सड़कों पर उतरकर आंदोलन कर रहे हैं. इस आंदोलन को दबाने के लिए पाकिस्तानी पुलिस और सुरक्षा बलों ने सीधी गोलियां चलाईं, जिसमें कई आम नागरिकों और जवानों की मौत हो चुकी है.
पाकिस्तान सरकार ने इस संगठन पर बैन तक लगा दिया था, लेकिन जनता का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा है. आंदोलनकारी खास तौर पर शरणार्थियों के नाम पर आरक्षित 12 सीटों और चुनावों में बड़े पैमाने पर की जा रही धांधली का विरोध कर रहे हैं. अब एक ऐसे ‘हारे हुए नेता’ का प्रधानमंत्री बनना आग में घी डालने जैसा काम करेगा.
क्या ढहने वाला है इस्लामाबाद का ये नाटक?
PoK में आज जो हालात हैं, वे ये बताने के लिए काफी हैं कि वहां की जनता अब पाकिस्तान के इस फर्जी लोकतंत्र और कठपुतली सरकारों से तंग आ चुकी है. भुखमरी, बेरोजगारी और अब इस ‘लूजर पीएम’ के थोपे जाने से वहां के लोगों के सब्र का बांध पूरी तरह टूट चुका है.
इफ्तिखार गिलानी का प्रधानमंत्री बनना इस्लामाबाद के लिए कोई जीत नहीं, बल्कि उस जन-आक्रोश की ज्वाला को और भड़काने का जरिया बन गया है जो आने वाले दिनों में पाकिस्तान के अवैध कब्जे की पूरी इमारत को ढहा देगा.

