कोच्चि से चौंकाने वाला मामला सामने आया है. यहां 12 साल के बच्चे के साथ उसकी मां ने बॉयफ्रेंड संग मिलकर मारपीट कर दी. दरअसल, बच्चे से उसकी मां ने कहा था कि तुम दूसरे बेडरूम में जाकर सो जाओ, लेकिन बच्चा नहीं माना. वह मां के पास ही सोता था. इसी बात को लेकर मां और उसके बॉयफ्रेंड ने उसे पीटना शुरू कर दिया. मां ने नाखूनों से उसे खरोंच डाला.
केरल के कोच्चि में हैरान करने वाली घटना सामने आई है. यहां 12 साल के बच्चे को उसकी मां ने अपने बॉयफ्रेंड संग मिलकर बेरहमी से पीट दिया. वजह सिर्फ इतनी थी कि बच्चा अपनी मां से अलग होकर दूसरे कमरे में सोने के लिए तैयार नहीं हुआ. इस मामले ने लोगों को हिलाकर रख दिया.एजेंसी के अनुसार, घटना कोच्चि के कलूर स्थित एक अपार्टमेंट की है. यहां 37 साल की महिला अपने 12 साल के बेटे के साथ रहती थी. पति से अलग होने के बाद वह यहां जॉब करती थी. कुछ महीनों से उसके जीवन में सिद्धार्थ राजीव नाम का युवक आया था, 24 साल का यूट्यूबर, जो धीरे-धीरे उसके साथ उसी अपार्टमेंट में रुकने लगा था. पुलिस के मुताबिक, दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने के बाद युवक अक्सर वहीं ठहरता था.
पुलिस का कहना है कि गुरुवार की रात जब महिला और उसके बॉयफ्रेंड ने बेटे से कहा कि वह दूसरे बेडरूम में जाकर सो जाए. बच्चा चूंकि हमेशा अपनी मां के साथ ही सोता था, इसलिए उसने कमरे से बाहर जाने से साफ इनकार कर दिया. इसी बात पर मां और उसके प्रेमी का गुस्सा फूट पड़ा.
रिपोर्ट के अनुसार, जब बच्चा जिद पर अड़ा रहा, तो सिद्धार्थ ने उसे धक्का दिया और पीटना शुरू कर दिया. बच्चे ने पुलिस को दिए बयान में कहा कि उसकी मां ने भी नाखूनों से उसके सीने और शरीर पर कई जगह खरोंचें, जिससे गंभीर चोटें आईं. बच्चा चिल्लाने लगा, जिसके बाद घटना की जानकारी उसके पिता तक पहुंची.
बच्चे का पिता तुरंत अपार्टमेंट पहुंचा और उसे अस्पताल ले गया. अस्पताल प्रशासन ने बच्चे के शरीर पर चोटों और खरोंचों के निशान देख तुरंत पुलिस को सूचना दी. इसके बाद इलामक्कारा पुलिस की टीम अस्पताल पहुंची और बच्चे के बयान दर्ज किए. पुलिस ने इस मामले में बच्चे की मां और सिद्धार्थ दोनों के खिलाफ एक्शन लिया है. केस दर्ज कर दोनों को अरेस्ट कर लिया गया है. आज शनिवार को कोर्ट में पेश करने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.Move upMove downToggle panel: Post Settings
शेख हसीना ने अमेरिका, पाकिस्तान और सेंट मार्टिन द्वीप पर अपने पुराने बयानों से बड़ा U-Turn लिया. जानें 2026 चुनाव से पहले यह बदलाव क्या संकेत देता है.
बांग्लादेश की अपदस्थ पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना अचानक एक नए राजनीतिक तेवर के साथ सामने आई हैं. उनके ताज़ा इंटरव्यू में दिए गए बयान न सिर्फ ढाका की राजनीति को, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया को चौंका रहे हैं. अगस्त 2024 में सत्ता से हटने के बाद हसीना जहां लगातार अमेरिका और पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराती रही थीं, अब वो बेहद नपा-तुला और संयमित रुख अपना रही है.
अगस्त 2024 में शासन बदलने के तुरंत बाद हसीना ने दावा किया था कि उनकी सरकार अमेरिकी दखल के कारण गिरी. उनके कई मंत्रियों तक ने कहा था कि वाशिंगटन ने राजनीतिक अस्थिरता का रास्ता तैयार किया, लेकिन अब हसीना बिल्कुल अलग लहजे में बात कर रही हैं. हालिया इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वे किसी एक देश को दोषी नहीं मानतीं. उनके अनुसार, उन्हें गलत सूचनाएं देकर राजनीतिक हालात बिगाड़े गए और इस पूरी कहानी में मोहम्मद यूनुस की भूमिका ज्यादा अहम रही. यह उनके पुराने बयानों से बिल्कुल उलटा रुख है.
कभी यूनुस को अमेरिका का हथियार बताने वाली हसीना अब कहीं अधिक संतुलित बयान दे रही हैं. उन्होंने कहा कि यूनुस को केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों का एक बड़ा नेटवर्क समर्थन देता है. साथ ही, वे यह भी कहती नजर आईं कि उन्हें अमेरिका से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है. उनका यह रुख संकेत देता है कि वे वाशिंगटन से रिश्ते सुधारने की तैयारी में हैं.
हसीना ने तख्तापलट के बाद पाकिस्तान के खिलाफ बेहद कड़े बयान दिए थे, लेकिन अब वे बहुत सीमित टिप्पणी कर रही हैं और कह रही हैं कि ढाका-इस्लामाबाद के बीच राजनयिक संबंधों में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. उनका यह नरम स्वर दक्षिण एशियाई भू-राजनीति के लिहाज से बड़ा संकेत माना जा रहा है.
लंबे समय से हसीना यह दावा करती रही थीं कि अमेरिका सेंट मार्टिन द्वीप पर अपना दबदबा बढ़ाना चाहता है. कई बार उन्होंने कहा था कि इस दबाव का विरोध करने के कारण ही उनकी सरकार को कमजोर किया गया, लेकिन अब अपने इंटरव्यू में उन्होंने इस मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी साध ली है. उनके शब्दों में कुछ बातें बंद दरवाज़ों के पीछे हुई थीं, जिन पर अभी चर्चा का सही समय नहीं है.
विशेषज्ञों का मानना है कि हसीना के इन बड़े बदलावों के पीछे गहरी रणनीति है.बांग्लादेश में फरवरी 2026 में आम चुनाव होने हैं और हसीना धीरे-धीरे अपने राजनीतिक समीकरण नए सिरे से साध रही हैं. इसके अलावा उनके समर्थक मौजूदा सरकार और यूनुस के खिलाफ खुलकर विरोध कर रहे हैं, जिससे देश की सत्ता व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है. दूसरी ओर, बीएनपी और जमात के रास्ते अलग होने से विपक्ष की स्थिति भी बिखरी हुई है, जिससे राजनीतिक तस्वीर और जटिल हो गई है.
आरबीआई के द्वारा दिसंबर महीने में होने वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की मीटिंग में रेपो रेट में कटौती होने की संभावना है. अर्थशास्त्रियों ने जानकारी दी कि, अक्टूबर महीने में महंगाई दर में कमी आई है.
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के द्वारा दिसंबर महीने में होने वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की मीटिंग में रेपो रेट में कटौती होने की संभावना है. गुरुवार को अर्थशास्त्रियों ने जानकारी दी कि, अक्टूबर महीने में महंगाई दर में कमी आई है. खुदरा महंगाई दर अक्टूबर में रिकॉर्ड 0.25 फीसदी के निचले स्तर पर पहुंची है, जो सितंबर महीने में 1.44 प्रतिशत थी.
बतौर जानकार, ये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) सीरीज में दर्ज की गई सबसे कम महंगाई दर है. कुल मिलाकर महंगाई इसलिए कम हुई है क्योंकि, एक तरफ खाने-पीने की चीजों की कीमतों में कमी आई है और वहीं दूसरी तरफ बाकी जरूरी सामानों की कीमतें भी धीमी रफ्तार से बढ़ रही हैं.
क्रिसिल की ओर से दी जानकारी के अनुसार, उम्मीद से अधिक खाद्य महंगाई दर में आई कमी, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों कम होने और जीएसटी रिफॉर्म के कारण खुदरा महंगाई दर इस वित्त वर्ष में औसत 2.5 प्रतिशत रह सकती है. जो कि पिछले साल के आंकड़े 4.6 प्रतिशत से काफी कम है. साथ ही जीएसटी रिफॉर्म का फायदा आम लोगों तक पहुंच रहा है. हालांकि, अक्टूबर महीने में जीएसटी का प्रभाव पूरी से तरह से ट्रांसफर नहीं हो पाया था. जिसका प्रभाव नवंबर महीने में देखने को मिलेगा.
साथ ही क्रिसिल ने आगे जानकारी देते हुए बताया कि, नवंबर महीने में खुदरा महंगाई दर 0.9 प्रतिशत है, जीसटी बदलावों से इनमें और गिरावट आने की संभावना है. साथ ही वित्त वर्ष 2026 में मुख्य महंगाई दर 2 फीसदी से कम रह सकती है.
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अक्टूबर में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला लिया था. रेपो रेट को 5.5 प्रतिशत रखने का निर्णय लिया गया था. इससे पहले अगस्त महीने में भी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया था. अमेरिका के द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ का असर समिति के निर्णय में देखने को मिला था.
दिल्ली लाल किला ब्लास्ट मामले में आरोपी डॉ. मुजम्मिल को 1200 रुपये महीने पर कमरा देने वाले मकान मालिक मद्रासी ने बताया कि मुजम्मिल13 सितंबर को आया, दो महीने का किराया देकर सामान रखकर चला गया और फिर कभी नहीं लौटा. जांच में खुलासा हुआ कि मुजम्मिल, अदील और उमर दो साल से साजिश रच रहे थे. उनकी डायरियों से 20 लाख रुपये जुटाने, 20 क्विंटल NPK खरीद और गुप्त चैट ग्रुप के सबूत मिले हैं.
दिल्ली के लाल किले के पास हुए धमाके की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, नए-नए पहलू सामने आ रहे हैं. डॉक्टर मुजम्मिल, डॉक्टर अदील की गिरफ्तारी के बाद अब आजतक उस मकान मालिक तक पहुंची है जिसने इन साजिशकर्ताओं में से एक को किराये पर कमरा दिया था. इस व्यक्ति खुद को मद्रासी नाम से ही पहचान बना रखी है और इसी नाम से इलाके में जाना-पहचाना जाता है.
गुरुग्राम-नूंह के ग्रे इलाकों में किराये पर कमरे देने वाले ऐसे कई लोग मिल जाते हैं, लेकिन इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुजम्मिल को कमरा देने वाले मद्रासी को यह तक नहीं पता था कि उसका किरायेदार कौन है, कहां काम करता है और किस मंशा से वहां रह रहा है. मद्रासी बताते हैं—मैंने तो बस 1200 रुपये महीने में कमरा दिया था. वह आया, बोला कमरे की जरूरत है, मैंने दे दिया. उसके बाद न उससे मुलाकात हुई, न बात. जो हुआ अच्छा नहीं हुआ.
मद्रासी ने कहा वह 13 सितंबर को आया था. बोला कि कमरा चाहिए. मैं किराये पर कमरे देता हूं, मैंने उसी तरह उसे भी एक कमरा दिखा दिया.उन्होंने आगे बताया, वह दिखने में बिल्कुल सामान्य लड़का था. पढ़ा-लिखा लगता था. बोला डॉक्टर हूं. मैंने बस इतना पूछा कि कहां ड्यूटी है, किस वार्ड में? उसने कहा कि अभी जॉइनिंग प्रोसेस में हूं. मुझे भी कुछ खास जानना नहीं था. दो महीने का किराया दिया 2400 रुपये. सामान रखा और चला गया. मद्रासी के अनुसार उसके बाद वह दोबारा कभी नहीं आया. वे कहते हैं कि कभी फोन पर बात भी नहीं हुई. कमरे में रखा सामान क्या था—यह भी उन्होंने कभी नहीं देखा. मेरे पास कौन-सा सीसीटीवी है जो मैं हर कमरे पर निगाह रख सकूं.
दिल्ली पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के सूत्रों ने खुलासा किया है कि लाल किला धमाका कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि पिछले दो साल से बुनी जा रही एक बड़ी साजिश का हिस्सा था. मुख्य साजिशकर्ता बताये जा रहे तीन नाम डॉ. मुजम्मिल, डॉ. अदील और डॉ. उमर. इन तीनों ने मिलकर लगभग 20 लाख रुपये कैश जुटाया, जो बाद में उमर को दिया गया. पुलिस के मुताबिक यह पैसा IED बनाने की सामग्री इकट्ठा करने में लगाया गया. इसी रकम से गुरुग्राम, नूंह और आसपास के इलाकों से 3 लाख रुपये खर्च कर 20 क्विंटल से ज़्यादा NPK उर्वरक खरीदा गया—जो विस्फोटक तैयार करने में इस्तेमाल होता है.
जांच में यह भी सामने आया है कि उमर ने सिग्नल ऐप पर 2–4 सदस्यों वाला छोटा ग्रुप बनाया था. इसमें अदील और मुजम्मिल भी शामिल थे. सारा कॉर्डिनेशन, पैसे का लेनदेन, मैटेरियल की खरीद और ट्रांसपोर्ट की जानकारी इसी ग्रुप के माध्यम से साझा होती थी. एजेंसी के एक अधिकारी के अनुसार ये लोग जानबूझकर छोटा ग्रुप रखते थे ताकि लीक होने का खतरा कम रहे. मैसेज तुरंत डिलीट करते थे और कोड वर्ड्स में चर्चा करते थे.”
डॉक्टर उमर और डॉक्टर मुजम्मिल के कमरों से बरामद डायरी और नोटबुक ने पूरी जांच की दिशा बदल दी है. ये डायरी अलफला यूनिवर्सिटी के कैंपस में स्थित रूम नंबर 4 (डॉ. उमर) और रूम नंबर 13 (डॉ. मुजम्मिल) से मिली है. पुलिस को एक और डायरी उस कमरे से मिली जहां से धौज में 360 किलो विस्फोटक बरामद किया गया था. यह जगह यूनिवर्सिटी से महज 300 मीटर की दूरी पर है. कई अधिकारियों का मानना है कि ये डायरी आने वाले दिनों में पूरी साजिश को समझने की कुंजी हो सकती हैं. डायरी में दर्ज कई पन्नों में कोड वर्ड्स, लोकेशन संकेत, तारीखें, प्रयोग सामग्री और लगभग 25 लोगों के नाम लिखे मिले हैं अधिकतर नाम जम्मू-कश्मीर और फरीदाबाद इलाके के हैं, जो अब पुलिस की जांच के दायरे में हैं.
डायरी में 8 से 12 नवंबर की तारीखों पर कई एंट्री हैं, जिनमें कुछ विशेष संकेत लिखे हुए हैं. दिल्ली में 10 नवंबर को कार ब्लास्ट हुआ था, और डायरी में दर्ज बातों से साफ पता चलता है कि यह सब पहले से तय और योजनाबद्ध था. जांचकर्ता बताते हैं— नवंबर की एंट्री से साफ है कि 8–12 तारीख के बीच कुछ बड़ा करने की तैयारी थी. हम कोड्स को डिकोड कर रहे हैं. इसमें उस वाहन, रास्तों और समय का उल्लेख भी हो सकता है.
जैसे-जैसे कमरे की जांच आगे बढ़ी, वैसे-वैसे मद्रासी का बेचैन होना बढ़ गया. वे बार-बार एक ही बात कहते रहे मैं बस कमरा देता हूं. मैं क्या जानता था कि वह ऐसा करेगा? उनके घर के बाहर खड़े पड़ोसी भी हैरान थे.एक बुजुर्ग बोले मद्रासी तो सीधा-सादा आदमी है. कभी किसी से लड़ाई नहीं. किराएदार आते-जाते रहते हैं. किसे पता कि कौन क्या करता है.
सीनियर अफसरों के मुताबिक, यह सिर्फ दिल्ली ब्लास्ट का मामला नहीं है. यह एक पूरे नेटवर्क का हिस्सा लगता है. दो साल की तैयारी और इतने बड़े लेवल पर सामग्री जुटाना अकेले संभव नहीं.
धौज गांव के आसपास लोग अब भी सदमे में हैं. अलफला यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्र पिछले दो दिनों से बाहर निकलते समय डरे हुए दिखते हैं. वहां अफवाहें भी तेजी से फैलीं कि कुछ और नाम सामने आने वाले हैं. हालांकि प्रशासन ने माहौल शांत रखने का अनुरोध किया है. एक स्थानीय छात्र ने कहाकि सोचा भी नहीं था कि हमारे हॉस्टल के ही पास कोई इतना खतरनाक प्लान कर रहा होगा. लगातार पुलिस आ रही है, फॉरेंसिक टीम घूम रही है. माहौल डरावना हो गया है.
इस सामूहिक विवाह समारोह में सभी धर्मों के जोड़ों ने विवाह किया. कहीं शहनाइयों की गूंज के बीच जोड़ों ने अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए, तो वहीं दूसरी ओर कलमे की तिलावत के साथ जोड़ों ने ‘कुबूल है’ कहकर अपना नया जीवन शुरू किया.उत्तर प्रदेश के बागपत में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह समारोह एक अद्वितीय मिसाल बन गया, जहां मानवता और एकता का अद्भुत संगम देखने को मिला. इस भव्य आयोजन में एक ही मंडप के नीचे सैकड़ों जोड़ों ने नए जीवन की शुरुआत की.
यह समारोह सिर्फ एक सरकारी योजना का क्रियान्वयन नहीं था, बल्कि सामाजिक सौहार्द, प्यार और बराबरी का उत्सव बन गया. बागपत की डीएम अस्मिता लाल के अनुसार, इस भव्य आयोजन में 300 जोड़ों की शादी करवाई गई.इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि जिले के प्रशासनिक अधिकारियों ने सरकारी अधिकारी की जगह परिवार के बड़े की भूमिका निभाई. जिलाधिकारी अस्मिता लाल खुद वहां हर जोड़े की ‘अभिभावक’ बनकर मौजूद थीं. उन्होंने कहा कि इस आयोजन में ‘एक फैमिली टच जैसा अहसास’ था.
जिले के तमाम अफसरों ने वर-वधू को आशीर्वाद दिया, गठबंधन बांधा और नवविवाहित जोड़ों को उनकी जरूरत का सामान देकर विदा किया.सामूहिक विवाह में शामिल हुई दूल्हा-दुल्हनों ने इस आयोजन की सराहना की. दुल्हन छवि शर्मा ने कहा, “मैं इस शादी से बहुत खुश हूं, यहां शादी में सब समान दिया जा रहा है. मैं योगी जी (मुख्यमंत्री) का और प्रशासन का धन्यवाद करती हूं.”
DM अस्मिता लाल ने बताया कि सभी अधिकारियों ने गठबंधन बांधा और दुल्हन को उसकी जरूरत का सामान देकर विदा किया गया है, जिससे यह आयोजन प्रशासन और जनता के बीच रिश्ते की नई परिभाषा रच गया.
बिहार का चुनाव एनडीए के लिए आसान नहीं था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आदि ने जितनी मेहनत की है वह सामने दिख रहा था. पर लैंडस्लाइड विक्ट्री केवल मेहनत का परिणाम नहीं होती है.
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों में एनडीए ऐतिहासिक लैंडस्लाइड विक्ट्री की ओर बढ रही है. अभी तक आए रुझान बता रहे हैं कि एनडीए 243 सीटों में से 192 सीटों पर आगे चल रही है.जबकि महागठबंधन 46 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है.जाहिर है कि यह जनादेश केवल विपक्ष की खामियों का नतीजा नहीं है बल्कि यह श्रेष्ठ कैंडिडेट , बेहतर नेतृत्व और शानदार स्ट्रैटजी का परिणाम है. फिलहाल इस लैंडस्लाइड विक्ट्री के 6 मुख्य पिलर रहे हैं.
नीतीश कुमार का निर्विवाद नेतृत्व
बिहार चुनाव में एनडीए की लैंडस्लाइड विक्ट्री के सबसे मजबूत पिलर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साबित हुए. 74 वर्षीय नीतीश, जो बिहार के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री हैं, ने अपनी राजनीतिक चतुराई और सामाजिक इंजीनियरिंग से गठबंधन को मजबूत आधार दिया. उनकी छवि ‘सुशासन बाबू’ की है, जो 2005 से बिहार को ‘जंगल राज’ से बाहर निकालने का प्रतीक बनी. नीतीश का नेतृत्व ही है कि कुर्मी (3.5%) जाति के होते हुए भी बिहार के सर्वमान्य नेता बने हुए हैं. चाहे ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग, 36%) हो जिसे नीतीश ने आरक्षण और कल्याण योजनाओं से एकजुट रखा या अगड़ी जातियां हों सभी वर्गों में वो मान्य हैं. मुसलमान भी उन्हें अपना दुश्मन नहीं समझते हैं. बहुत से मुसलमानों ने भी उन्हें वोट दिया है. नीतीश की उम्र और स्वास्थ्य पर सवाल उठे, लेकिन उन्होंने अपने खिलाफ चले सभी नरेटिव को झुठला दिया.
चिराग पासवान का सपोर्ट मिट्टी को सोना बना दिया
चिराग पासवान के सपोर्ट को कहीं से भी कम करके नहीं आंका जा सकता है. एनडीए को उनका सपोर्ट ही है कि बिहार में जनता दल यूनाइटेड हो या बीजेपी दोनों ही पार्टियां अपना बेहतरीन प्रदर्शन कर रही है. 43 वर्षीय चिराग, रामविलास पासवान के पुत्र, ने अपनी युवा ऊर्जा और पासवान वोट बैंक (5-6%) को एकजुट कर गठबंधन को मजबूत किया.एनडीए की ओर से उनकी पार्टी एलजेपी (आरवी) को 29 सीटें मिलीं थीं.
चिराग के सपोर्ट को समझने के लिए हमें यह समझना होगा कि कैसे उनके एनडीए से बाहर होने के चलते 2020 में जेडीयू और बीजेपी को नुकसान हुआ था. 2020 में उन्होंने नीतीश को 40 सीटें गंवाने पर मजबूर किया. बीजेपी को भी कई सीटों पर नुकसान हुआ था. 2025 में वे एनडीए जॉइन कर ‘भाई चिराग’ बन गए, और मोदी ने उनकी तारीफ की.
उनकी 100 से अधिक रैलियां और सोशल मीडिया पर उनकी जबरदस्त उपस्थिति ने पासवान वोटों को एकजुट किया, जो दलित समुदाय (16%) का बड़ा हिस्सा है. पारस धड़े (आरएलजेपी) के बावजूद चिराग ने वोट स्प्लिट नहीं होने दिया. इतना ही नहीं आज की तारीख में वो एक मात्र ऐसे नेता बनकर उभरे हैं जो अपने वोटों को दूसरी पार्टियों में ट्रांसफर कराने की कूवत भी रखता है. नतीजों में साफ दिख रहा है कि चिराग के वोट जेडीयू और बीजेपी में सफलतापूर्क ट्रांसफर हुए हैं.
3- एनडीए गठबंधन में आपसी समन्वय
एनडीए में बिहार चुनावों के दौरान गजब का समन्वय देखने को मिला. बीजेपी और जेडीयू में आपसी प्रतिस्पर्धा के बावजूद कहीं से भी सीटों को लेकर अनबन होती नहीं दिखी. दोनों ही दलों ने खुद को 101 -101 सीटों पर खुद को समेट लिया. शुरू में एलजेपी और हम आदि में कुछ असंतोष दिखा पर जल्द ही मामला सुलझा लिया गया. सही समय पर सीटों के प्रत्याशी भी घोषित हो गए. दूसरी तरफ महागठबंधन अंतिम समय तक सीट शेयरिंग को लेकर जूझता रहा . यहां तक कि पर्चा वापस लेने का समय सीमा समाप्त होने के बाद भी महागठबंधन के दल आपस में लड़ते रहे. बिहार की जनता बेवकूफ नहीं है .वह सब देख रही थी.
4- मुख्यमंत्री चेहरे पर बीजेपी की स्ट्रेटजी
मुख्यमंत्री चेहरे पर सस्पेंस बनाने को बीजेपी की रणनीति को सबसे कमजोर कड़ी माना जा रहा था. पर यह उल्टा साबित हुआ है. बीजेपी ने नीतीश कुमार समर्थक और उनके विरोधी दोनों ही तरह के वोटर्स को साधने को लेकर यह रणनीति अपनाई जो सफल होती दिख रही है. दरअसल बीजेपी यह जानती थी कि बहुत से बीजेपी समर्थक राज्य में नीतीश को मुख्यमंत्री के रूप में देखने की बजाए किसी बीजेपी नेता को सीएम बनाना चाहते थे. दूसरी तरफ नीतीश कुमार बिहार में निर्विवाद छवि वाले नेता हैं. उनको हर वर्ग और समुदाय में एक समान सम्मान प्राप्त है. बीजेपी उन्हें नकार भी नहीं सकती थी. इसलिए पार्टी ने एक रणनीति के तरह उनके नाम पर कन्फ्यूजन बनाए रखा. यही रणनीति बीजेपी ने दिल्ली, महाराष्ट्र और हरियाणा आदि में भी किया था.
5- सुशासन और विकास
सुशासन और विकास एनडीए की विक्ट्री का तीसरा पिलर रहा, जो नीतीश के 20 वर्षों के शासन का प्रमाण है. बिहार, जो 1990 में ‘बिमारू’ राज्य था, अब सड़कें (1 लाख किमी), बिजली (95% कवरेज) और शिक्षा में प्रगति कर रहा है. नीतीश का सुशासन—कानून-व्यवस्था सुधार, अपराध दर 50% गिरावट ने मध्यम वर्ग को आकर्षित किया. विकास योजनाएं जैसे स्मार्ट सिटी और एक्सप्रेसवे ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति दी. एनडीए का ‘संकल्प पत्र’ फेज्ड नौकरियां और इंफ्रास्ट्रक्चर पर केंद्रित था, जो विश्वसनीय लगा.जीविका दीदी ने 1.2 करोड़ महिलाओं को जोड़ा, जिसका असर मतदान में दिखा. बेरोजगारी पर नीतीश ने स्किल डेवलपमेंट से जवाब दिया.
जमीनी लाभार्थी योजनाएं
जमीनी लाभार्थी योजनाओं ने बिहार के ग्रामीण और गरीबों के लिए जितना काम किया है उतना किसी और राज्य में नहीं दिखा. नीतीश की सात निश्चय और बीजेपी की केंद्रीय स्कीम्स ने 5 करोड़ लाभार्थियों को बेनिफिट पहुंचाया. पीएम आवास, उज्ज्वला और आयुष्मान ने ग्रामीण वोटरों को बांध के रखा. ये योजनाएं जातिगत रूप से संतुलित रहीं, ईबीसी और दलित वोटरों को सबसे अधिक फायदा पहुंचा. नीतीश की स्ट्रेटजी महिलाओं के कल्याण पर टिकी रही. महिलाओं को पंचायतों और सरकार नौकरियों में आरक्षण ने एनडीए को मजबूत आधार दिया.
अजय देवगन और रकुल प्रीत सिंह की ‘दे दे प्यार दे’ (2019) एक बड़ी हिट थी. उम्र की सीमा को तोड़ने वाली लव स्टोरी पर बनी इस मजेदार कॉमेडी का अब सीक्वल आया है. आर माधवन और मीजान जाफरी इस बार नई एंट्री बनकर आए हैं. क्या ‘दे दे प्यार दे 2’ पिछली फिल्म जितनी मजेदार है?
कलाकार : अजय देवगन, आर माधवन, रकुल प्रीत सिंह, गौतमी कपूर, मीजान जाफरी, जावेद जाफरी निर्देशक :अंशुल शर्मा ‘हम पढ़े-लिखे, प्रोग्रेसिव लोग हैं. हम मॉडर्न लोग हैं, समझते हैं…’ इस एक लाइन को बहुत इंडियन परिवारों ने जिस तरह ओढ़ा है. और इसकी आड़ में जिस तरह के मैनीपुलेशन पेरेंट्स करते हैं, ‘दे दे प्यार 2’ तगड़ी कॉमेडी के साथ इस लाइन पर करारा व्यंग्य करने वाली फिल्म है.
लव रंजन का अपना एक ट्रेडमार्क फिल्मी स्टाइल है. इसमें ढेर सारी सेल्फ-अवेयर कॉमेडी, मजेदार ड्रामा और ट्विस्ट भरी लव स्टोरीज होती हैं. ‘दे दे प्यार दे’ लव रंजन के प्रोडक्शन से निकली ऐसी ही मजेदार फिल्म थी. मगर इसे लव ने सिर्फ प्रोड्यूस किया था. तरुण जैन के साथ मिलकर उन्होंने फिल्म की कहानी जरूर लिखी थी, लेकिन डायरेक्ट करने का जिम्मा आकिव अली को मिला था. ‘दे दे प्यार दे 2’ में राइटर फिर से लव और तरुण ही हैं, पर इस बार डायरेक्टर अंशुल शर्मा हैं. डायरेक्टर बदला है, कास्ट में नए एक्टर्स जुड़े हैं. मगर ‘दे दे प्यार दे 2’ न सिर्फ एक दमदार सीक्वल बनकर आई है. बल्कि ये पहली फिल्म से बेहतर भी है.
अजय देवगन की ‘दे दे प्यार दे’ एक लव स्टोरी लेकर आई थी जिसमें करीब 50 साल की उम्र के आदमी को, अपने से आधी उम्र की लड़की से प्यार हो जाता है. इस लड़की, आयशा का रोल रकुल प्रीत सिंह ने किया था. पहली फिल्म में अजय का किरदार आशीष, अपनी पत्नी मंजू (तब्बू) से अलग हो चुका था, मगर कागजों पर डाइवोर्स नहीं हुआ था. अपनी इस यंग गर्लफ्रेंड से शादी करने के इरादे लेकर जब वो मंजू और बच्चों के सामने पहुंचता है, तब सिचुएशन कॉमेडी और ड्रामा लेकर आती है.
अब ‘दे दे प्यार दे 2’ में ये लव स्टोरी पहुंची है आयशा के घर. शादी के लिए आशीष (अजय देवगन) को आयशा के पेरेंट्स का अप्रूवल चाहिए. आर माधवन और गौतमी इन पेरेंट्स के रोल में हैं. उनका दावा है कि वो ‘एजुकेटेड, प्रोग्रेसिव मॉडर्न लोग हैं’ और अपनी बेटी के इस अफेयर से उन्हें कोई समस्या नहीं है. मगर क्या इंडियन सोशल सिस्टम और पेरेंटिंग ट्रेडिशन में धंसा ये कपल, इस शादी के लिए राजी होगा? यही ‘दे दे प्यार दे 2’ की कहानी है.
तरुण जैन और लव रंजन ने ‘दे दे प्यार दे 2’ की राइटिंग को जिस तरह सॉलिड बनाया है, वो अलग से तारीफ करने लायक है. माधवन और गौतमी के किरदारों का असली नाम भी आपको पता नहीं चलता. दोनों एक दूसरे को बड़े प्रेम और सम्मान के साथ राज जी और राज जी बुलाते हैं. दोनों ने लव मैरिज ही की थी, मगर बेटी के लव में उम्र का अंतर देखकर दोनों शॉक में हैं. इस शॉक को वो अपनी मीठी बोली और सालोंसाल प्रैक्टिस की गई आधुनिकता में जिस तरह छुपाते हैं, वो फिल्म में देखना बहुत मजेदार है.
माधवन के किरदार ने ये जो आधुनिकता ओढ़ी है, वो उनकी बहू के साथ उनके बर्ताव में बेहतर दिखता है. वो अपने घर का अगला चिराग देने जा रही प्रेग्नेंट बहू को ऐसे ट्रीट कर रहे हैं कि बेटी को इग्नोर कर दे रहे हैं. मगर अपनी बेटी के, 50 साल के लवर को देखकर उनका सारा प्रोग्रेसिव बर्ताव कपूर की तरह उड़ जाता है. एक बार तो ऐसा लगता है कि माधवन में 90s की हीरोइन का, अमरीश पुरी जैसा बाप दिख रहा है. मगर वो तो मॉडर्न हैं न! इसलिए अपनी बेटी को सही रास्ते पर लाने के लिए उन्होंने जो मैनिपुलेटिव तरीके लगाए हैं, उन्हें लव रंजन स्टाइल सिनेमा ही बेहतर तरीके से कैप्चर कर सकता है, सीरियस आर्ट सिनेमा नहीं.
‘दे दे प्यार दे 2’ शुरू होते ही क्रेडिट्स के साथ जावेद जाफरी (जो पहली फिल्म से अजय के दोस्त बने हैं) मजेदार स्टाइल में पिछली फिल्म का रीकैप देते हैं. इस कॉमिक रीकैप से ही फिल्म का टोन सेट हो जाता है. इसमें सेल्फ-अवेयर कॉमेडी और पंच का तगड़ा तड़का है. पंच के मामले में तो ‘दे दे प्यार दे 2’ कॉमेडी लिखने वालों के लिए एक किताब की तरह है.
अजय देवगन की ही ‘सिंघम’ और ‘हम आपके हैं कौन’ जैसी फिल्मों को मजेदार तरीके से कॉमेडी के लिए यूज किया गया है. अजय की रियल लाइफ पत्नी काजोल, कॉमेडी का हिस्सा हैं. जावेद जाफरी के बेटे मीजान जाफरी ‘दे दे प्यार दे 2’ में ऐसा लड़के के रोल में है, जिसे आयशा को पटाने के लिए उसके पापा ने काम पर लगाया है. जावेद और मीजान का रियल लाइफ रिश्ता भी फिल्म की मजेदार कॉमेडी के काम आता है. पूरी फिल्म में पंच और चटपटे डायलॉग जमकर हैं जो कहीं भी माहौल फीका नहीं पड़ने देते.
‘दे दे प्यार दे 2’ के हीरो अजय देवगन हैं, मगर माहौल बनाया है माधवन ने. उनकी बेटी का बॉयफ्रेंड, उनसे सिर्फ डेढ़ साल छोटा है. पूरे ड्रामा का भार उनके ऊपर है. उनकी दमदार एक्टिंग ने इस रोल को इतना मजेदार बना दिया है कि फिल्म में आप उन्हें ही देखते रहते हैं. आयशा की मां बनी गौतमी कपूर की भी इस मामले में तारीफ बनती है.
अजय देवगन फिल्म में एक लवर तो हैं मगर मैच्योर आदमी भी हैं. इसलिए जब उनकी गर्लफ्रेंड के बाप को दिक्कतें होनी शुरू होती हैं तो वो ‘समझदार’ होने का परिचय देने लगता है. वो कोई कनफ्लिक्ट नहीं चाहता. इसलिए शांति से सबकुछ होते देखता है. इसलिए कई बार तो आपको ऐसा लगेगा कि फिल्म में अजय देवगन हैं ही नहीं. मगर असल में ऐसा होना ही फिल्म को जरूरी माहौल भी देता है. क्योंकि फिल्म सिर्फ आयशा के पेरेंट्स का ही टेस्ट नहीं है, उसके ‘मैच्योर’ लवर का भी टेस्ट है.
एक लव मैरिज में फेल हो चुका ये आदमी, दूसरी बार प्यार में तो पड़ चुका है. लेकिन क्या उसमें फिर से अपने प्यार के लिए लड़ने की ताकत बची है? है तो वह भी उसी जेनरेशन का, जिसमें आयशा के पेरेंट्स आते हैं! इस जेनरेशन में एक तरफ तो अपने हर पर्सनल फैसले के लिए समाज से अप्रूवल की भूख है, दूसरी तरफ इन्हें पर्याप्त मॉडर्न भी दिखना है. यहां अजय का सधा हुआ काम उनके किरदार के पूरी तरह काम आता है. अगर आपको फिल्म देखते हुए कुछ जगहों पर लगे कि अजय तो जैसे हैं ही नहीं, तो धैर्य बनाए रखिएगा क्योंकि यही उनका किरदार है.
‘दे दे प्यार 2’ वैसे तो कॉमेडी से लगातार माहौल बनाए रखती है. मगर फिर भी कई जगहों पर ड्रामा को जगह देने के लिए जब कॉमेडी साइड होती है तो फिल्म स्लो लगने लगती है. हालांकि, तबतक कॉमेडी फिर ओवरटेक कर लेती है. इंटरवल के बाद सेकंड हाफ में फिल्म का एंटी क्लाइमेक्स थोड़ा स्लो लगता है. आपको ऐसा लगता है कि फिल्म फिर से वही गलतियां करने जा रही है, जो अक्सर लव रंजन ब्रांड ऑफ सिनेमा में होती हैं.
किरदार कन्फ्यूज लगने लगते हैं और स्टीरियोटाइप बन जाते हैं. मगर इसका क्लाइमेक्स एक बहुत बड़ा सरप्राइज है. इसके बारे में किसी से कुछ ना सुनें, सीधा फिल्म देखें. पूरी फिल्म में कोई भी दिक्कत लगे, मगर इसका क्लाइमेक्स ही अपने आप में फिल्म का टिकट खरीदने की पर्याप्त वजह है.
‘दे दे प्यार दे 2’ एक पिता के ईगो, और आदर्शवादी लवर के बीच फंसी लड़की की कहानी है. ये लड़की खुद क्या चाहती है इसकी परवाह ना पिता को है, ना लवर को. दोनों को बस अपने-अपने आदर्शों पर खरा उतरना है. मगर ये लड़की जिस तरह इस बीमारी का ट्रीटमेंट करती है, वो कम से कम एक बार तो जरूर देखने लायक है. रकुल प्रीत सिंह को उनकी खूबसूरती के लिए तो लोग बहुत देखते हैं मगर इस बार उन्हें एक दमदार रोल मिला है, जिसे राइटर ने बहुत मजेदार तरीके से लिखा है. इस लिखे हुए को स्क्रीन पर दमदार तरीके से उतारने के लिए रकुल की तारीफ बनती है.
कुल मिलाकर ‘दे दे प्यार दे 2’ एक मजेदार कॉमेडी फिल्म है जिसके सेंटर में दमदार सोशल मैसेज और फैमिली ड्रामा है. एक-एक एक्टर का काम दमदार है. गाने फिल्म को थोड़ा स्लो जरूर करते हैं मगर सुनने में अच्छे हैं. डायलॉग बहुत कर्रे हैं और पंच जोरदार. पेस इधर-उधर थोड़ी स्लो पड़ती है, कुछ सीन लम्बे और गैर जरूरी भी लगते हैं. मगर ओवरऑल अंशुल शर्मा की फिल्म सॉलिड एंटरटेनमेंट डिलीवर करती है, जिसके लिए कम से कम एक बार तो टिकट खरीदा जा सकता है.
क्या आप भी अपार्टमेंट में रहते है और आप के घर में भी छोटे बच्चे है? तो फिर यह घटना आपके लिए जाननी बहुत जरूरी है और ज्यादा चौकन्ना रहना भी जरूरी है. गुजरात के राजकोट जिले के जेतपुर शहर से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है.
जेतपुर शहर के देसाईवाड़ी क्षेत्र स्थित शिवशक्ति अपार्टमेंट की तीसरी मंज़िल से खेलते-खेलते 5साल का मासूम बच्चा खिड़की से नीचे गिर गया. बच्चे को तुरंत सरकारी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया. यह पूरी घटना सीसीटीवी कैमरे में भी कैद हो गई. घटना और भी दर्दनाक इसलिए है, क्योंकि मृतक पांच वर्षीय जयराज अपनी तीन बहनों का सबसे छोटा और इकलौता भाई था.
पुलिस इंस्पेक्टर एडी परमार ने बताया की जेतपुर शहर के देसाईवाड़ी इलाके में पी स्थित शिवशक्ति अपार्टमेंट में परेश भाई और जानवीबेन देवमुरारी अपने चार बच्चों (बेटियां महक (17), वृंदा (15), सेजल (12) और बेटा जयराज के साथ तीसरी मंजिल पर रहती हैं.
दोपहर के समय जब जानवीबेन घर में बाजू के रूम में सो रही थीं, तब जयराज घर के दूसरे कमरे में खेल रहा था. खेलते-खेलते जयराज अचानक खिड़की से नीचे गिर गया. गिरने की तेज आवाज सुनते ही अपार्टमेंट के सभी लोग बाहर दौड़े आए, तो देखा कि जयराज नीचे जमीन पर लहूलुहान हालत में पड़ा था. हालांकि, पुलिस इस मामले की सभी एंगल से जांच कर रही है. देखें Video:-
जानवीबेन भी अपनी बेटियों के साथ नीचे पहुंचीं और तुरंत बेटे को सरकारी अस्पताल ले जाया गया. लेकिन अस्पताल में डॉक्टर ने जांच के बाद जयराज को मृत घोषित कर दिया. बताया जा रहा है कि गिरने से सिर में गंभीर चोट (हेमरेज) लगने के कारण जयराज की मौके पर ही मौत हो गई थी.तीन बहनों के इकलौते भाई की आकस्मिक मौत से मां और तीनों बहनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया. अस्पताल में मातम का माहौल छा गया था.
अमाल मलिक ने बीती रात आए एपिसोड के दौरान बिग बॉस और शो के मेकर्स पर कई सारे आरोप लगाए थे. अब सिंगर की बातों पर रिएक्ट करते हुए, बिग बॉस ने अपनी नाराजगी जताई है.
सलमान खान के सबसे कॉन्ट्रोवर्शियल शो ‘बिग बॉस’ में बीते कुछ दिन काफी कुछ घटा. घर में मिड वीक एविक्शन हुआ, जिसमें मृदुल तिवार को शो से बाहर होना पड़ा. फिर कल के एपिसोड में गौरव खन्ना, जो पिछले काफी वक्त से घर का कप्तान बनने की कोशिश कर रहे थे, फाइनली बिग बॉस के नए कैप्टन बन गए.
लेकिन गौरव का कप्तान बनना कई लोगों को रास नहीं आया. जिस तरह से एक्टर को नया कैप्टन बनाया गया, उससे शहबाज बदेशा, अमाल मलिक और तान्या मित्तल काफी खफा हुए. दरअसल, गौरव खन्ना के साथ शहबाज बदेशा भी घर का कप्तान बनने की दावेदारी में थे. लेकिन उन्हें इस कैप्टेंसी टास्क में हिस्सा लेने का मौका नहीं मिल पाया.
गौरव के कप्तान बनने के साथ सभी घरवाले नॉमिनेट हुए. लेकिन घरवालों की नाराजगी नॉमिनेट होने से ज्यादा, शहबाज को अपनी दावेदारी पेश करने का मौका नहीं मिलने पर थी. शहबाज ने घर में हड़कंप मचा दिया. उनके साथ अमाल मलिक भी जुड़ गए, जिन्होंने बिग बॉस और शो पर ‘बायस्ड’, ‘चीटर’ और ‘अनफेयर’ होने जैसे आरोप लगाए.
अब शो का नया प्रोमो सामने आया है, जिसमें बिग बॉस सभी घरवालों को असेंबली एरिया में बुलाकर, अपने ऊपर लग रहे आरोपों को लेकर बात कर रहे हैं. बिग बॉस ने कहा कि उन्हें घर में कई चीजें कही गईं. लेकिन सच कहा जाए, तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. इसके बाद, गौरव खन्ना और अमाल मलिक को एक-दूसरे संग तू-तू मैं-मैं करते देखा गया.
गौरव ने अमाल से कहा कि वो बिग बॉस के सामने जाकर पलट गए. जिसपर अमाल ने कहा कि वो इस बात को हक से मानते हैं. सिंगर ने आगे कहा ‘अगर तूफान से टकराएगा, तो भस्म हो जाएगा. ऐसे ही नहीं हूं मैं अमाल मलिक.’ अब आगे देखने वाली बात होगी कि क्या इस बवाल के कारण, गौरव खन्ना की कप्तानी खतरे में आएगी या नहीं.
बिग बॉस एक ऐसा शो है, जिसपर आए दिन ‘बायस्ड’ होने के आरोप लगते रहते हैं. इस पचड़े में सलमान खान भी फंस चुके हैं. उनपर भी कुछ कंटेस्टेंट्स के खिलाफ ‘बायस्ड’ होने की बातें कही जाती हैं. सोशल मीडिया पर ये विवाद पिछले कई सालों से चला आ रहा है. कई एक्स कंटेस्टेंट्स भी इस मुद्दे पर अपनी राय रख चुके हैं.
श्रावस्ती के इकौना क्षेत्र में एक ही परिवार के पांच लोग संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए. रोज अली, पत्नी शहनाज और उनके तीन बच्चों के शव कमरे में मिले. सुबह दरवाज़ा न खुलने पर बहन रुबीना ने खिड़की से झांककर घटना देखी. पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने मौके पर पहुँचकर जांच शुरू कर दी है. मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सका है.
यूपी के श्रावस्ती जिले से शुक्रवार सुबह ऐसी खबर आई जिसने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया. कैलाशपुर मनिहार तारा गांव में एक ही परिवार के पांच लोग संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए. रोजमर्रा की शांत सुबह अचानक भय और सन्नाटे में बदल गई, जब एक बंद कमरे का दरवाजा न खुलने पर परिजनों को अनहोनी का शक हुआ. लेकिन किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि दरवाजा टूटने के बाद सामने इतना भयावह दृश्य दिखाई देगा. घर के अंदर पति–पत्नी और उनके तीन मासूम बच्चों के शव बिखरे पड़े मिले. यह खबर देखते ही देखते गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई.