Sunday, September 20, 2026
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NATIONAL : कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं; बागी सांसदों पर भड़के संजय राउत

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महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना के दोनों गुटों के बीच जारी जुबानी जंग अब और भी तेज और चुभाने वाली हो गई है। उद्धव ठाकरे गुट (Shiv Sena UBT) के 6 लोकसभा सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने की अटकलों के बीच शनिवार को राज्यसभा सांसद और यूबीटी नेता संजय राउत ने सोशल मीडिया पर एक बेहद तीखा और परोक्ष हमला बोला है। संजय राउत ने एक तस्वीर शेयर की जिस पर हिंदी में लिखा था, “कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं होते।” इस पोस्ट को शेयर करते हुए राउत ने कैप्शन में लिखा, “जय महाराष्ट्र!”

संजय राउत का यह पोस्ट ऐसे समय में आया है जब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट को 2022 की ऐतिहासिक बगावत के बाद पार्टी में दूसरे सबसे बड़े विभाजन के खतरे का सामना करना पड़ रहा है।

शिवसेना (UBT) का यह संकट गुरुवार को उस समय और गहरा गया जब नई दिल्ली में संसद भवन परिसर में बुलाई गई संसदीय दल की महत्वपूर्ण बैठक से पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 गायब रहे। इस बैठक में केवल अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे ही शामिल हुए थे। बैठक से नदारद रहने वाले बागी सांसदों में नागेश पाटिल-आष्टीकर, संजय देशमुख, संजय जाधव, संजय दीना पाटिल, ओमप्रकाश राजे निंबालकर और भाऊसाहेब वाकचौरे शामिल हैं।

इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए संजय राउत ने पत्रकारों से कहा, “ये लोग जो खुद को शिवसैनिक कहते थे, कायर हैं। शिवसैनिक इतने कायर नहीं होते। ये खुद को शिवसैनिक मानते हैं और अब छिपने के लिए कहां गए हैं? जयपुर में।”

संजय राउत ने आगे कहा, “कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इन सभी को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। हम इन्हें अयोग्य ठहराने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। अगर लोकसभा के अध्यक्ष नियमों, कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार काम करते हैं तो ये लोग निश्चित रूप से अयोग्य घोषित कर दिए जाएंगे।”

क्या है ऑपरेशन टाइगर?
महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में इस संभावित बड़े दलबदल को ऑपरेशन टाइगर (Operation Tiger) का नाम दिया जा रहा है। इस चर्चा को तब और हवा मिली जब शिवसेना के एमएलसी (MLC) चंद्रकांत रघुवंशी ने दावा किया कि उद्धव गुट के 6 सांसदों ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में अपना विश्वास जताया है और वे पहले ही इस गुट के साथ अपनी सहमति बना चुके हैं।

इस विपरीत परिस्थितियों के बावजूद संजय राउत ने दावा किया कि पार्टी पूरी ताकत से वापसी करेगी। उन्होंने कहा, “शिवसेना ने अपने गौरवशाली 60 साल पूरे कर लिए हैं और इस समय बालासाहेब ठाकरे का जन्मशताब्दी वर्ष भी चल रहा है। हम हमेशा बालासाहेब ठाकरे से प्रेरणा लेते हैं। जब तक इस बुराई का खात्मा नहीं हो जाता, हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।”

BUSINESS : विदेश जाना हुआ महंगा: सरकार ने बढ़ाए पासपोर्ट के शुल्क, 1 जुलाई से 36 पेज के लिए देने होंगे ₹2,500

क्या आप विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं? केंद्र सरकार ने 1 जुलाई 2026 से पासपोर्ट बनवाने की फीस में बड़ा इजाफा किया है। जानिए नॉर्मल, तत्काल और बच्चों के पासपोर्ट के नए रेट्स। पूरी खबर पढ़ें।

विदेश घूमने, पढ़ाई करने या काम के सिलसिले में देश से बाहर जाने की योजना बना रहे लोगों की जेब पर अब अतिरिक्त बोझ पड़ने वाला है। केंद्र सरकार ने नया पासपोर्ट बनवाने और पुराने को रिन्यू कराने की फीस में भारी इजाफा कर दिया है। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी ‘पासपोर्ट (संशोधन) नियम, 2026’ के तहत नई दरें 1 जुलाई, 2026 से पूरे देश में लागू हो जाएंगी। आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि आपकी जेब पर इसका कितना असर होने वाला है।

18 वर्ष से अधिक उम्र वालों के लिए अब क्या होगी नई फीस?
नए नियमों के अनुसार, 18 साल या उससे अधिक उम्र के वयस्कों के लिए पासपोर्ट सेवाओं की दरों में सीधे तौर पर बदलाव किया गया है:

36-पेज का पासपोर्ट: पहले इसके लिए 1,500 रुपये देने होते थे, लेकिन अब नॉर्मल फीस बढ़ाकर 2,500 रुपये कर दी गई है। वहीं, अगर आप इसे ‘तत्काल’ सेवा के तहत बनवाते हैं, तो आपको कुल 5,000 रुपये चुकाने होंगे।
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60-पेज का पासपोर्ट: जो लोग ज्यादा सफर करते हैं और 60 पेज का जंबो पासपोर्ट बनवाते हैं, उन्हें अब 2,000 रुपये के बजाय 3,500 रुपये देने होंगे। इसका तत्काल शुल्क 6,000 रुपये तय किया गया है।
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बच्चों (18 साल से कम) के पासपोर्ट पर महंगाई का कितना असर पड़ा है?
बच्चों के पासपोर्ट की फीस भी बढ़ा दी गई है। 18 वर्ष से कम आयु के आवेदकों के लिए नया 36-पेज का पासपोर्ट बनवाने का शुल्क 1,000 रुपये से बढ़ाकर 1,750 रुपये कर दिया गया है। यदि बच्चों का पासपोर्ट तत्काल श्रेणी में बनवाना है, तो इसके लिए 4,250 रुपये देने होंगे। ध्यान रहे, नाबालिगों का पासपोर्ट 5 साल या उनके 18 वर्ष का होने तक (जो भी पहले हो) ही वैध रहता है।

पासपोर्ट खोने या डैमेज होने पर कितना लगेगा चार्ज?
अगर आपका पासपोर्ट गुम हो जाता है या किसी वजह से खराब (डैमेज) हो जाता है, तो डुप्लीकेट पासपोर्ट निकलवाना अब काफी महंगा सौदा होगा:

36-पेज रिप्लेसमेंट: नॉर्मल कैटेगरी में इसके लिए 5,000 रुपये और तत्काल में 7,500 रुपये लगेंगे।
60-पेज रिप्लेसमेंट: नॉर्मल में 6,000 रुपये और तत्काल में 8,500 रुपये चुकाने होंगे।
बच्चों का रिप्लेसमेंट (36-पेज): नॉर्मल कैटेगरी में 4,250 रुपये और तत्काल में 6,750 रुपये फीस निर्धारित की गई है।
पुलिस क्लीयरेंस और अन्य जरूरी सर्टिफिकेट के लिए क्या हैं नए रेट?
पासपोर्ट सेवाओं से जुड़े अन्य दस्तावेजों के शुल्क में भी बदलाव किया गया है। अब पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट (PCC), सरेंडर सर्टिफिकेट और ग्लोबल एंट्री प्रोग्राम वेरिफिकेशन जैसे अन्य विविध प्रमाणपत्रों के लिए 750 रुपये का शुल्क देना होगा। इसके अलावा, ‘सर्टिफिकेट ऑफ आइडेंटिटी’ बनवाने का खर्च 1,000 रुपये होगा।

क्या बुजुर्गों और छोटे बच्चों को सरकार से कोई राहत मिलेगी?
राहत की बात यह है कि सरकार ने कुछ विशेष वर्गों के लिए 10 प्रतिशत की छूट को बरकरार रखा है। 8 साल तक के छोटे बच्चों और 60 साल से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों (सीनियर सिटीजन) के नए आवेदन पर यह 10 फीसदी की छूट मिलती रहेगी।

NATIONAL : ‘आपातकाल इतिहास का काला अध्याय’: अमित शाह का कांग्रेस पर प्रहार, कहा- कुचली गई संविधान की आत्मा

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 25 जून 1975 को भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय बताते हुए तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार पर संविधान की आत्मा और प्रेस की आजादी को कुचलने का आरोप लगाया है। ‘संविधान हत्या दिवस’ के मौके पर उन्होंने लोकतंत्र के योद्धाओं को श्रद्धांजलि दी और कहा कि इस दिन को याद रखने से भविष्य में लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को देश के इतिहास में आपातकाल को एक ‘काला अध्याय’ करार दिया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से लगाए गए आपातकाल का जिक्र करते हुए कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाए। अमित शाह ने कहा कि उस दौरान कांग्रेस ने संविधान की आत्मा को कुचलने का प्रयास किया था।

मोदी सरकार की ओर से घोषित ‘संविधान हत्या दिवस’ के अवसर पर गृह मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर यह संदेश साझा किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि 25 जून 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे अंधकारमय दौर था।

गृह मंत्री अमित शाह ने इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि यह दिन भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का वह काला अध्याय है, जब इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी ने सत्ता के अहंकार और लालच में आकर देश के नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी पर ताला लगा दिया था।

शाह ने कहा कि इस दौरान न केवल प्रेस की स्वतंत्रता को छीना गया, बल्कि संविधान की मूल भावना को भी नष्ट करने की पूरी कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि उस समय के शासकों के लिए देश के लोकतांत्रिक मूल्य उनकी व्यक्तिगत सत्ता की भूख के सामने बेहद बौने साबित हो गए थे।

लोकतंत्र के रक्षकों को शाह ने दी श्रद्धांजलि
इस खास मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उन सभी लोगों को याद किया, जिन्होंने आपातकाल का खुलकर विरोध किया था। उन्होंने कहा, ‘संविधान हत्या दिवस के अवसर पर मैं लोकतंत्र के उन सभी योद्धाओं को अपनी आदरपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आपातकाल के क्रूर शासन के खिलाफ एक लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी।’

अमित शाह ने आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले और यातनाएं सहने वाले सत्याग्रहियों के साहस की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इन सेनानियों के संघर्ष के कारण ही देश में दोबारा लोकतंत्र की बहाली संभव हो सकी थी।ये भी पढ़ें

NATIONAL : ‘ऑपरेशन सिंदूर से मिला सबक’: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बोलीं-आत्मनिर्भरता ही संकट में देश का असली रक्षक

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने साबित कर दिया कि किसी भी देश की सैन्य तैयारी और रणनीतिक ताकत के लिए स्वदेशी रक्षा क्षमताएं, आधुनिक तकनीक और मजबूत घरेलू उद्योग बेहद जरूरी हैं। उन्होंने MES के प्रशिक्षु अधिकारियों से आत्मनिर्भरता, सतत विकास और नवाचार को प्राथमिकता देने का आह्वान किया।

आज के दौर में आत्मनिर्भरता सिर्फ विकास का लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक मजबूती की भी अहम जरूरत बन गई है। ऑपरेशन सिंदूर ने यह साफ कर दिया कि किसी देश की सैन्य तैयारी और रणनीतिक प्रभाव को मजबूत बनाने में स्वदेशी रक्षा क्षमताओं की कितनी बड़ी भूमिका होती है। यह बातें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गुरुवार को राष्ट्रपति भवन में मिलिट्री इंजीनियर सर्विसेज के 2023 और 2024 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए कही। मुर्मू ने आगे कहा कि दुनिया इस समय संघर्षों और भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में वही देश ज्यादा मजबूत स्थिति में रहता है, जो अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर कम और खुद पर ज्यादा निर्भर हो। आत्मनिर्भर देश संकट की घड़ी में अपनी आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ विकास संबंधी प्राथमिकताओं को भी बेहतर तरीके से पूरा कर सकता है।

7 से 10 मई 2025 के बीच हुआ था ऑपरेशन सिंदूर
गौरतलब है कि ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा 7 से 10 मई 2025 के बीच चलाया गया अभियान था। इस दौरान पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मौजूद आतंकवादी और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया था। यह कार्रवाई 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में की गई थी, जिसमें 26 लोगों की जान चली गई थी। इनमें अधिकांश पर्यटक थे।

‘MES देश के रक्षा ढांचे की रीढ़’
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज दुनिया कई पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है और ऐसे समय में सतत विकास कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। उन्होंने प्रशिक्षु अधिकारियों से ग्रीन टेक्नोलॉजी अपनाने, ऊर्जा और पानी की बचत करने, हरियाली बढ़ाने, कचरा कम करने और अपने काम के हर स्तर पर पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देने की अपील की। मुर्मू ने कहा कि मजबूत, कुशल और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार इंफ्रास्ट्रक्चर न केवल वर्तमान जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के हितों की भी रक्षा करेगा। उन्होंने कहा कि MES देश के रक्षा ढांचे की रीढ़ है। रणनीतिक महत्व के सैन्य ठिकानों का निर्माण और रखरखाव कर यह संगठन सशस्त्र बलों की परिचालन क्षमता को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है।

‘महिलाओं ने देश के संस्थानों को मजबूत बनाया’
राष्ट्रपति ने रक्षा क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सेना, नौसेना, वायुसेना और अन्य रक्षा संगठनों में महिलाएं लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रही हैं और उन जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभा रही हैं, जिन्हें कभी उनकी पहुंच से बाहर माना जाता था। महिलाओं की पेशेवर दक्षता, नेतृत्व क्षमता, साहस और समर्पण ने देश के संस्थानों को और मजबूत बनाया है तथा राष्ट्रीय सुरक्षा को नई मजबूती दी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में MES में भी बड़ी संख्या में महिला अधिकारी नजर आएंगी।

NATIONAL : सरकार का बड़ा फैसला, अब पहले की ही तरह आसानी से मिलेंगे सिलेंडर, कमर्शियल LPG से हटी पाबंदी

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सरकार ने औद्योगिक और कमर्शियल एलपीजी उपभोक्ताओं को बड़ी राहत दी है। गैर-घरेलू पैक्ड एलपीजी की आपूर्ति पर लगाए गए सभी सेक्टोरल प्रतिबंध हटा दिए गए हैं और इसकी सप्लाई को पश्चिम एशिया संकट से पहले के स्तर पर वापस बहाल कर दिया गया है। इसके साथ ही, थोक (बल्क) एलपीजी की आपूर्ति, जिसे संकट के दौरान पूरी तरह बंद कर दिया गया था, अब फिर से शुरू कर दी गई है। सरकार ने इसकी सप्लाई को संकट से पहले की खपत के 50% तक मंजूरी दी है, जिससे उद्योगों और व्यावसायिक संस्थानों को काफी राहत मिलेगी।

स्पॉन्सर किया गया
पश्चिम एशिया संकट के दौरान घरेलू एलपीजी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत विशेष आदेश जारी किए थे। इन आदेशों के अनुसार, C3-C4 स्ट्रीम्स का उपयोग पेट्रोकेमिकल और अन्य उद्योगों में करने के बजाय केवल एलपीजी उत्पादन के लिए करने का निर्देश दिया गया था, ताकि देश में एलपीजी की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

इस वजह से लिया गया फैसला
अब देश में एलपीजी का उत्पादन बेहतर होने और आयातित एलपीजी की उपलब्धता बढ़ने की संभावना को देखते हुए, सरकार ने C3/C4 स्ट्रीम्स को केवल एलपीजी के लिए उपयोग करने की अनिवार्यता को कम करने का फैसला किया है। अब इन स्ट्रीम्स का उपयोग पहले की तरह कुछ हद तक अन्य उद्योगों में भी किया जा सकेगा।

C3-C4 स्ट्रीम्स का जो अतिरिक्त उपयोग अब गैर-एलपीजी क्षेत्रों के लिए किया जाएगा, उसे इस तरह लागू किया जाएगा कि घरेलू एलपीजी की सप्लाई पर कोई असर न पड़े। साथ ही, देश में स्वदेशी एलपीजी उत्पादन कम से कम 40 टीएमटी प्रति दिन बना रहे, यह भी सुनिश्चित किया जाएगा।

सेंटर ऑफ हाई टेक्नोलॉजी की होगी जिम्मेदारी
मंत्रालय के तहत काम करने वाले ‘सेंटर ऑफ हाई टेक्नोलॉजी’ को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह पेट्रोकेमिकल और अन्य जरूरी क्षेत्रों के लिए इन C3/C4 स्ट्रीम्स का सही तरीके से वितरण करे और हर संगठन को उसका हिस्सा तय करके दे। इसके साथ ही, उसे मंत्रालय को समय-समय पर इसकी रिपोर्ट भी भेजनी होगी।

पश्चिम एशिया संकट के कारण जब दुनिया भर में एलपीजी की आपूर्ति प्रभावित हुई, तब सरकार ने सबसे पहले देश के घरेलू उपभोक्ताओं को लगातार एलपीजी मिलती रहे, इसे अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाया। इसी वजह से कमर्शियल पैक्ड एलपीजी की आपूर्ति पर कुछ समय के लिए रोक लगाई गई थी। सरकार के समय पर लिए गए फैसलों और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के मिलकर किए गए प्रयासों से वैश्विक सप्लाई की समस्याओं के बावजूद देश में एलपीजी की आपूर्ति स्थिर बनी रही।

सरकार ने कंपनियों को दिया निर्देश
सरकार ने तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को निर्देश दिया है कि वे वाणिज्यिक और औद्योगिक एलपीजी उपभोक्ताओं का पूरा और व्यवस्थित डेटा हमेशा अपडेट रखते रहें, ताकि आपूर्ति और योजना को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सके। इसके साथ ही, निगरानी और कामकाज में बेहतर समन्वय के लिए OMCs के पास एक एकीकृत सेक्टर-आधारित डेटाबेस भी तैयार रखा जाएगा।

इसके साथ ही सरकार पाइप से मिलने वाली प्राकृतिक गैस (PNG) की सुविधा को बढ़ाने के लिए काम कर रही है। जो वाणिज्यिक और थोक उपभोक्ता पहले से PNG का उपयोग कर रहे हैं, वे आगे भी उसी का इस्तेमाल जारी रखेंगे। इसके अलावा, जिन एलपीजी उपभोक्ताओं तक PNG नेटवर्क पहुंच चुका है या जो PNG पर शिफ्ट होने की प्रक्रिया में हैं, उन्हें धीरे-धीरे PNG पर स्थानांतरित किया जाएगा। यह काम सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों के साथ मिलकर किया जाएगा।

NATIONAL : हाईकोर्ट का एक फैसला कैसे बना आपातकाल की बड़ी वजह? इसी ने इंदिरा के करियर पर लगाया था सबसे बड़ा दाग

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देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लागू किया गया, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि कई महीने पहले तैयार हो चुकी थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द करने, बढ़ते विपक्षी आंदोलन और राजनीतिक संकट के बीच सरकार ने आपातकाल का फैसला लिया। 21 महीने तक चले इस दौर को भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा माना जाता है। आखिर ऐसा क्या हुआ था कि अदालत के फैसले के सिर्फ 13 दिन बाद इंदिरा को देश में आपातकाल लागू करना पड़ा?

25 जून 1975 की रात भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे विवादास्पद रातों में से एक मानी जाती है। इसी रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर देश में आंतरिक आपातकाल लागू किया गया। इसके साथ ही नागरिकों के कई मौलिक अधिकार सीमित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, हजारों विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और केंद्र सरकार के हाथों में असाधारण शक्तियां केंद्रित हो गईं।

25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक करीब 21 महीने चले इस दौर को भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा माना जाता है। आपातकाल को लेकर आज भी बहस होती है कि यह देश की स्थिरता के लिए जरूरी कदम था या फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सबसे बड़ा प्रहार।

हालांकि, आपातकाल की कहानी 25 जून की रात से शुरू नहीं होती। इसकी पृष्ठभूमि कई महीनों से तैयार हो रही थी। बढ़ता विपक्षी आंदोलन, आर्थिक चुनौतियां, सरकार विरोधी प्रदर्शन और सबसे बढ़कर 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला, जिसने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया था। इस फैसले ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया और अगले 13 दिनों में घटनाएं इतनी तेजी से बदलीं कि अंततः देश आपातकाल की ओर बढ़ गया।

ऐसे में सवाल है कि आपातकाल लागू करने के पीछे क्या परिस्थितियां थीं? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ क्या फैसला दिया था? अदालत के निर्णय के बाद राजनीतिक संकट कैसे गहराया? और आखिर 25 जून 1975 की रात ऐसा क्या हुआ कि देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया? आइए विस्तार से जानते हैं।

The Court Ruling That Challenged Indira Gandhi and Set the Stage for the Emergency
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी – फोटो : अमर उजाला
12 जून 1975 को क्या हुआ?
12 जून का इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला समझने के लिए 1971 में जाना होगा। जब लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने समाजवादी नेता राज नारायण को हराया था। चुनाव में हार के बाद राज नारायण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी और अधिकारियों का दुरुपयोग किया। उन्होंने दावा किया कि चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल किया गया और सरकारी कर्मचारी उनके चुनाव अभियान में शामिल रहे।

करीब चार साल तक चली सुनवाई के बाद 19 मार्च 1975 को एक अभूतपूर्व घटना हुई। इंदिरा गांधी अदालत में गवाही देने वाली भारत की पहली प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने लगभग पांच घंटे तक न्यायालय में सवालों के जवाब दिए। इसके बाद 12 जून को इहालाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया। इसके 13 दिन बाद 25 जून की रात को देश में आपातकाल लगा। आइये जानते हैं इन 13 दिनों की पूरी कहानी…

12 जून 1975: हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
12 जून 1975 की सुबह इलाहाबाद हाई कोर्ट के कक्ष संख्या 15 में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने फैसला सुनाया। 238 पृष्ठों के निर्णय में अदालत ने 14 आरोपों में से 12 को खारिज कर दिया, लेकिन दो आरोपों को सही माना।

पहला आरोप
इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे यशपाल कपूर ने औपचारिक रूप से सरकारी पद छोड़ने से पहले ही उनके चुनाव एजेंट के रूप में काम करना शुरू कर दिया था।

दूसरा आरोप
उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने चुनावी सभाओं के लिए मंच, बिजली और अन्य व्यवस्थाएं उपलब्ध कराईं। अदालत ने माना कि यह सरकारी मशीनरी का चुनावी उपयोग था, जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लंघन था।

अदालत ने उनके 1971 के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया और उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए 20 दिन का समय दिया गया। देश में पहली बार किसी मौजूदा प्रधानमंत्री का चुनाव अदालत ने रद्द किया था। इससे सरकार की वैधता पर सवाल उठने लगे।

13 जून 1975: इस्तीफे की मांग शुरू
फैसले के अगले ही दिन विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया और इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की। उनका तर्क था कि जब चुनाव अवैध घोषित हो चुका है तो नैतिक रूप से प्रधानमंत्री पद पर बने रहना उचित नहीं है। प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा इंडिया आफ्टर नेहरू में लिखते हैं कि कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के समर्थन में व्यापक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन शुरू कर दिया। हरियाणा के तत्कलीन मुख्यमंत्री बंसीलाल बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों को दिल्ली लाने लगे, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी और जनता का बड़ा हिस्सा अब भी प्रधानमंत्री के साथ है। उनके समर्थन में नारे लगाए गए, जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा के पुतले भी जलाए गए।

14 से 19 जून 1975: समर्थन और विरोध का दौर
गुहा ने बताया कि इस दौरान इंदिरा गांधी कई बार बाहर आकर समर्थकों को संबोधित करती रहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की कुछ राजनीतिक ताकतें विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं और उनके विरोधियों के पास अपार संसाधन उपलब्ध हैं। मामला कानूनी विवाद से आगे बढ़कर अस्तित्व की राजनीतिक लड़ाई बन गया।

20 जून 1975: बोट क्लब की विशाल रैली
गुहा बताते हैं कि इस शक्ति प्रदर्शन का चरम 20 जून 1975 को देखने को मिला, जब दिल्ली के बोट क्लब मैदान में इंदिरा गांधी ने एक विशाल रैली को संबोधित किया। अपने दोनों बेटों और बहू सोनिया गांधी की मौजूदगी में उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार की सार्वजनिक सेवा की विरासत का उल्लेख किया और कहा कि वह अपनी अंतिम सांस तक देश की सेवा करती रहेंगी।

21-22 जून 1975: कांग्रेस में मंथन
कांग्रेस के भीतर चर्चा शुरू हुई कि अगर सुप्रीम कोर्ट भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है तो आगे क्या होगा। कुछ नेताओं ने अस्थायी इस्तीफे की सलाह दी, लेकिन इंदिरा गांधी इसके लिए तैयार नहीं दिखीं। सत्ता के भीतर असुरक्षा और अनिश्चितता बढ़ने लगी।

23 जून 1975: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
इंदिरा गांधी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। पूरे देश की नजर अदालत पर थी। अब सबको सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का इंतजार था।

24 जून 1975: आधी राहत, आधा संकट
न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने इंदिरा गांधी को सीमित राहत दी। उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति मिली, लेकिन सांसद के रूप में मतदान करने और वेतन लेने पर रोक लगा दी गई। यानी उन्हें पूरी राहत नहीं मिली थी और उनका राजनीतिक भविष्य अब भी सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर निर्भर था। दिलचस्प बात यह थी कि न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने भी अपने फैसले में संकेत दिया था कि जिन चुनावी उल्लंघनों के आधार पर उन्होंने फैसला सुनाया, वे कानून में वर्णित सबसे गंभीर चुनावी अपराधों की श्रेणी में नहीं आते। रामचंद्र गुहा बताते हैं कि इसी बीच कांग्रेस और सरकार के भीतर यह चर्चा शुरू हुई कि संकट को टालने के लिए इंदिरा गांधी अस्थायी रूप से इस्तीफा दे सकती हैं। कुछ नेताओं ने सुझाव दिया कि मामले का अंतिम फैसला आने तक वरिष्ठ कांग्रेस नेता जगजीवन राम को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन इंदिरा गांधी इस विकल्प के लिए तैयार नहीं हुईं और राजनीतिक संकट लगातार गहराता गया।

इतिहासकार ग्यान प्रकाश अपनी पुस्तक Emergency Chronicles में लिखते हैं कि इंदिरा गांधी को यह विश्वास नहीं था कि अगर वह अस्थायी रूप से प्रधानमंत्री पद छोड़ती हैं तो बाद में आसानी से सत्ता में लौट पाएंगी। प्रकाश के अनुसार, उन्हें लगने लगा था कि उनके खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक साजिश चल रही है। वह आशंकित थीं कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन उनके विरोधियों को समर्थन दे रहे हैं। इस संदर्भ में वह अक्सर चिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे के तख्तापलट का उदाहरण देती थीं। ग्यान प्रकाश के मुताबिक, ऐसे समय में उनके पुत्र संजय गांधी, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल, कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता लगातार उन्हें पद पर बने रहने की सलाह दे रहे थे।

The Court Ruling That Challenged Indira Gandhi and Set the Stage for the Emergency
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी – फोटो : अमर उजाला
25 जून 1975 (दिन): रामलीला मैदान में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन
जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली को संबोधित किया। उन्होंने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग दोहराई और 29 जून से राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने की घोषणा की। जेपी ने पुलिस और सेना से भी संविधान और नैतिकता के अनुरूप काम करने की अपील की।

25 जून 1975 (शाम): आपातकाल की तैयारी
प्रधानमंत्री के करीबी सलाहकारों ने स्थिति की समीक्षा की। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने आंतरिक आपातकाल लगाने का कानूनी मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की सिफारिश भेजी गई।

25 जून 1975 (रात): राष्ट्रपति की मंजूरी
राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सिफारिश पर हस्ताक्षर कर दिए और देश में “आंतरिक अशांति” (Internal Disturbance) के आधार पर आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी।

26 जून 1975 की सुबह: देश को आपातकाल की जानकारी
इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब के अनुसार, आपातकाल लागू होने के बाद इंदिरा गांधी ने देश और विदेश में इसे उचित ठहराने की व्यापक कोशिश की। उन्होंने अपनी मित्र और कलाकार पुपुल जयकर को लिखे एक संदेश में कहा कि बढ़ती हिंसा, नफरत और गलत सूचनाओं को रोकने के लिए आपातकाल आवश्यक था। उन्होंने दावा किया कि केवल लगभग 900 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और अधिकांश को जेलों में नहीं बल्कि आरामदायक स्थानों पर रखा गया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि देश में शांति और अमन-चैन का माहौल है व आपातकाल का उद्देश्य देश को सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों की ओर वापस ले जाना है।

हालांकि गुहा लिखते हैं कि वास्तविकता इससे अलग थी। देशभर में पुलिस विपक्षी नेताओं, छात्र कार्यकर्ताओं, मजदूर संगठनों और कांग्रेस विरोधी समूहों से जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर रही थी। जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई जैसे बड़े नेताओं को हिरासत में लिया गया, जबकि हजारों लोगों को मीसा (MISA) कानून के तहत बिना मुकदमे जेलों में बंद कर दिया गया। गुहा के अनुसार, गिरफ्तार लोगों की संख्या इंदिरा गांधी द्वारा बताए गए आंकड़ों से कहीं अधिक थी।

गुहा बताते हैं कि आपातकाल के शुरुआती महीनों में इंदिरा गांधी ने विदेशी मीडिया को कई साक्षात्कार दिए। उन्होंने लंदन के संडे टाइम्स से कहा कि आपातकाल सत्ता बचाने के लिए नहीं बल्कि जयप्रकाश नारायण द्वारा पैदा की गई कथित असंवैधानिक चुनौती का जवाब था। उन्होंने दावा किया कि देश को अव्यवस्था और विघटन से बचाने व आर्थिक कार्यक्रमों को लागू करने के लिए यह कदम उठाना पड़ा। Saturday Review को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि आपातकाल लोकतंत्र को खत्म करने के लिए नहीं बल्कि उसकी रक्षा के लिए लगाया गया है। उन्होंने पश्चिमी मीडिया की आलोचना करते हुए कहा कि भारत की तुलना पाकिस्तान और चीन जैसे अधिनायकवादी देशों से करना अनुचित है।

रामचंद्र गुहा के अनुसार, आपातकाल के दौरान सरकार ने अनुशासन और नैतिकता को प्रमुख नारे के रूप में प्रचारित किया। सरकारी प्रचार तंत्र ने “अनुशासन ही देश को महान बनाता है”, “काम ज्यादा, बातें कम” और ”स्वदेशी खरीदें, भारतीय बनें” जैसे नारे पूरे देश में फैलाए। इसके साथ ही इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व को मजबूत नेतृत्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। बड़े-बड़े होर्डिंगों और सरकारी प्रचार में उन्हें व्यवस्था और स्थिरता की गारंटी के रूप में दिखाया गया।

मौलिक अधिकारों पर रोक
आपातकाल लागू होने के बाद नागरिकों के कई मौलिक अधिकार प्रभावी रूप से निलंबित हो गए। 27 जून 1975 को अनुच्छेद 358 और 359 लागू किए गए।

अनुच्छेद 358 के तहत
नागरिकों को अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली स्वतंत्रताएं निलंबित कर दी गईं, जिनमें शामिल थीं:

बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार
संगठन बनाने का अधिकार
देश में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार
अनुच्छेद 359 के तहत
सरकार ने नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ अदालत जाने के अधिकार से भी वंचित कर दिया। इसका असर विशेष रूप से अनुच्छेद 14, 21 और 22 पर पड़ा, जो समानता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

बड़े पैमाने पर हुई गिरफ्तारियां
आपातकाल लागू होते ही हजारों विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया।गिरफ्तार होने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल थे:

जयप्रकाश नारायण
मोरारजी देसाई
अटल बिहारी वाजपेयी
लालकृष्ण आडवाणी
इन गिरफ्तारियों के लिए मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) का उपयोग किया गया। शाह आयोग के अनुसार लगभग 35 हजार लोगों को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया।

NATIONAL : PM मोदी का 4 जुलाई को पिंक सिटी का दौरा, रिफाइनरी से लेकर मेट्रो तक की मिलेगी सौगात

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मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 4 जुलाई को जयपुर शहर को बड़ी सौगात देने जा रहे हैं जिसके तहत शहर की परिवहन व्यवस्था मजबूत होगी.

जयपुर नगर निगम की ओर से पट्टा वितरण और लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया. इस दौरान कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की मौजूदगी रही. मुख्यमंत्री ने 631 करोड़ रुपये की लागत से 1538 विकास कार्यों का लोकार्पण और शिलान्यास किया. उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि विकास के इन कार्यों से प्रदेश की आधारभूत ज़रूरतें पूरी होंगी और विकास को नई गति मिल सकेगी.

4 जुलाई को बड़ी सौगात देने जा रहे पीएम मोदी

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 4 जुलाई को जयपुर शहर को बड़ी सौगात देने जा रहे हैं जिसके तहत शहर की परिवहन व्यवस्था मजबूत होगी. जयपुर मेट्रो फेज-2 परियोजना 13 हजार करोड़ रुपया की लागत से विकसित की जाएगी. इस परियोजना का शिलान्यास खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 4 जुलाई को करेंगे.

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि जयपुर मेट्रो फेज-2 राजधानी में यातायात को अधिक सुगम बनाने, यात्रा समय कम करने और शहरी विकास को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगीं. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों में ऐसी कई योजनाएं शुरू हुई हैं, जिन्होंने शहरों को विकास का इंजन बनाया हैं.

प्रधानमंत्री 4 जुलाई को राजस्थान दौरे पर रहेंगें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजस्थान की बाड़मेर में पचपदरा रिफाइनरी का उद्घाटन 4 जुलाई को करेंगें. पचपदरा रिफाइनरी का पहले 21 अप्रैल को उद्घाटन होना थां. इससे एक दिन पहले 20 अप्रैल को रिफाइनरी में आग लग गई थीं. इसके बाद पीएम मोदी का दौरा स्थगित करना पड़ा था. अब रिफाइनरी के साथ प्रधानमंत्री जयपुर मेट्रो फेस-2 का शिलान्यास भी करेंगें.

प्रधानमंत्री के दौरे को देखते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा नें अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक ली. बैठक में मुख्यमंत्री ने रिफ़ाइनरी और मेट्रो सहित विभिन्न लोकार्पण और शिलान्यास कार्यक्रम को लेकर निर्देश दिए. साथ ही उन्होंने विभिन्न सरकारी नौकरियों में चयनित युवाओं को नियुक्ति पत्र वितरण समारोह से जुड़ी तैयारियों को लेकर अधिकारियों को निर्देश दीं.

BUSINESS : शुरुआती कारोबार में शेयर बाजार में तेजी, सेंसेक्स और निफ्टी उछले

नई दिल्ली, 25 जून (हि.स.)। घरेलू शेयर बाजार में आज शुरुआती कारोबार के दौरान तेजी का रुख बना हुआ नजर आ रहा है। आज के कारोबार की शुरुआत भी बढ़त के साथ हुई थी। हालांकि बाजार खुलते ही बिकवाली का दबाव बनने के कारण सेंसेक्स और निफ्टी दोनों सूचकांकों की चाल में थोड़ी गिरावट भी आई, लेकिन थोड़ी देर बाद ही खरीदारों ने लिवाली का जोर बना कर स्थिति को संभाल लिया।

सुबह 10 बजे तक का कारोबार होने के बाद सेंसेक्स 0.69 प्रतिशत और निफ्टी 0.62 प्रतिशत की मजबूती के साथ कारोबार कर रहे थे।

10 बजे तक का कारोबार होने के बाद स्टॉक मार्केट के दिग्गज शेयरों में से इंटर ग्लोबल एवियशन, अदानी एंटरप्राइजेज, ट्रेंट लिमिटेड, टेक महिंद्रा और बजाज फाइनेंस के शेयर 4.95 प्रतिशत से लेकर 2.97 प्रतिशत की मजबूती के साथ कारोबार कर रहे थे। दूसरी ओर, बजाज ऑटो, एनटीपीसी, ओएनजीसी, टाटा स्टील और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स के शेयर 2.74 प्रतिशत से लेकर 1.54 प्रतिशत की कमजोरी के साथ कारोबार करते हुए नजर आ रहे थे।

अभी तक के कारोबार में स्टॉक मार्केट में 2,754 शेयरों में एक्टिव ट्रेडिंग हो रही थी। इनमें से 1,528 शेयर मुनाफा कमा कर हरे निशान में कारोबार कर रहे थे, जबकि 1,226 शेयर नुकसान उठा कर लाल निशान में कारोबार कर रहे थे। इसी तरह सेंसेक्स में शामिल 30 शेयरों में से 22 शेयर लिवाली के सपोर्ट से हरे निशान में बने हुए थे। दूसरी ओर आठ शेयर बिकवाली के दबाव में लाल निशान में कारोबार कर रहे थे, जबकि निफ्टी में शामिल 50 शेयरों में से 35 शेयर हरे निशान में और 15 शेयर लाल निशान में कारोबार करते नजर आ रहे थे।

बीएसई का सेंसेक्स आज 399.85 अंक की तेजी के साथ 77,391.07 अंक के स्तर पर खुला। कारोबार की शुरुआत होते ही बिकवाली का दबाव बन जाने के कारण यह सूचकांक फिसल कर 77,280.49 अंक तक आ गया। इसके बाद खरीदारों ने लिवाली का जोर बना दिया, जिससे इस सूचकांक की स्थिति में सुधार होने लगा। बाजार में लगातार जारी खरीद बिक्री के बीच सुबह 10 बजे तक का कारोबार होने के बाद सेंसेक्स 530.35 अंक की बढ़त के साथ 77,521.57 अंक के स्तर पर कारोबार कर रहा था।

सेंसेक्स की तरह ही एनएसई के निफ्टी ने आज 104.20 अंक की छलांग लगा कर 24,125.85 अंक के स्तर से कारोबार की शुरुआत की। बाजार खुलते ही बिकवाली का दबाव बनने पर यह सूचकांक लुढ़क कर 24,107.80 अंक के स्तर तक पहुंच गया। इसके बाद खरीदारों ने लिवाली का जोर बना दिया, जिससे इस सूचकांक की चाल में तेजी आ गई। बाजार में लगातार जारी लिवाली और बिकवाली के बीच सुबह 10 बजे तक का कारोबार होने के बाद निफ्टी 150.05 अंक की मजबूती के साथ 24,171.70 अंक के स्तर पर कारोबार कर रहा था।

इसके पहले पिछले कारोबारी दिन बुधवार को सेंसेक्स 790.54 अंक यानी 1.04 प्रतिशत की मजबूती के साथ 76,991.22 अंक के स्तर पर बंद हुआ था। वहीं निफ्टी ने 197.55 अंक यानी 0.83 प्रतिशत की उछाल के साथ 24,021.65 अंक के स्तर पर बुधवार के कारोबार का अंत किया था।

RAJASTHAN : राजस्थान में मानसून की दस्तक तेज, 25 जिलों में आज भी बारिश-आंधी का अलर्ट

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जयपुर, 25 जून (हि.स.)। राजस्थान में मानसून की रफ्तार तेज होने के साथ ही प्री-मानसून गतिविधियां भी जोर पकड़ने लगी हैं। मौसम विभाग ने गुरुवार को प्रदेश के 25 जिलों में आंधी और बारिश की चेतावनी जारी की है। पिछले 24 घंटों के दौरान राज्य के कई जिलों में अच्छी बारिश हुई, जिससे लोगों को गर्मी से राहत मिली है।

मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार भरतपुर, जयपुर, नागौर, सीकर और श्रीगंगानगर सहित कई जिलों में बुधवार को एक इंच या उससे अधिक वर्षा हुई। वहीं पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों में गर्मी का असर बना रहा। श्रीगंगानगर प्रदेश का सबसे गर्म जिला रहा, जहां अधिकतम तापमान 42.5 डिग्री सेल्सियस रहा।

जयपुर, भरतपुर, अजमेर, कोटा, बीकानेर और उदयपुर संभाग के जिलों में दिनभर हल्के बादल छाए रहे और उमस का असर महसूस किया गया। कई क्षेत्रों में शाम के समय बारिश और बूंदाबांदी का दौर भी चला।

प्रदेश में श्रीगंगानगर के बाद फलोदी में 42 डिग्री, जैसलमेर में 40.7, बीकानेर में 40.4, बाड़मेर में 40.3 और चित्तौड़गढ़ में 40.2 डिग्री सेल्सियस तापमान मापा गया। पाली में 39.3, जोधपुर और दौसा में 39.2, जबकि जालोर और हनुमानगढ़ में 38 डिग्री सेल्सियस तापमान रहा।

भरतपुर जिले के कामां में 40, पहाड़ी में 15 और डीग में 8 मिमी बारिश हुई। नागौर के लाडनूं में 47 मिमी वर्षा हुई, जबकि अजमेर जिले के केकड़ी में 11 और सावर में 16 मिमी बारिश हुई। सीकर के रींगस में 31, हनुमानगढ़ के डबलीराठन में 36 तथा श्रीगंगानगर के लालगढ़ जाटान में 26 मिमी बारिश हुई।

बीकानेर, झुंझुनूं, अलवर, बारां, झालावाड़ और चित्तौड़गढ़ के कई इलाकों में भी हल्की से मध्यम बारिश हुई।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार आगामी दिनों में प्रदेश के पूर्वी और उत्तरी हिस्सों में बारिश की गतिविधियां और बढ़ सकती हैं। इससे तापमान में गिरावट आने तथा लोगों को भीषण गर्मी से राहत मिलने की संभावना है। हालांकि कुछ पश्चिमी जिलों में फिलहाल गर्मी और उमस का असर बना रह सकता है।

BUSINESS : सर्राफा बाजार में सस्ता हुआ सोना, चांदी के भाव में बदलाव नहीं

नई दिल्ली, 25 जून (हि.स.)। घरेलू सर्राफा बाजार में आज शुरुआती कारोबार के दौरान सोने की कीमत में गिरावट का रुख बना हुआ नजर आ रहा है। भाव में आई कमजोरी के कारण आज चेन्नई के अलावा देश के ज्यादातर दूसरे सर्राफा बाजार में सोना 250 रुपये प्रति 10 ग्राम से लेकर 270 रुपये प्रति 10 ग्राम तक सस्ता हो गया है। वहीं चेन्नई में सोने के भाव में 2,100 रुपये प्रति 10 ग्राम से लेकर 2,290 रुपये प्रति 10 ग्राम तक की बड़ी गिरावट आई है। चांदी के भाव में आज कोई बदलाव नहीं हुआ है।

सोने की कीमत में आई कमजोरी के कारण देश के ज्यादातर सर्राफा बाजार में 24 कैरेट सोना 1,44,320 रुपये प्रति 10 ग्राम से लेकर 1,45,630 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है। इसी तरह 22 कैरेट सोना आज 1,32,290 रुपये प्रति 10 ग्राम से लेकर 1,33,490 रुपये प्रति 10 ग्राम के बीच बिक रहा है। चांदी के भाव में बदलाव नहीं होने के कारण ये चमकीली धातु दिल्ली सर्राफा बाजार में आज भी 2,44,900 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर बिक रही है।

दिल्ली में 24 कैरेट सोना आज 1,44,470 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है, जबकि 22 कैरेट सोने की कीमत 1,32,440 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई है। वहीं देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में 24 कैरेट सोना 1,44,320 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना 1,32,290 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है। इसी तरह अहमदाबाद में 24 कैरेट सोने की रिटेल कीमत 1,44,370 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोने की कीमत 1,32,340 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई है।

इन प्रमुख शहरों के अलावा चेन्नई में 24 कैरेट सोना आज 1,45,630 रुपये प्रति 10 ग्राम की कीमत पर और 22 कैरेट सोना 1,33,490 रुपये प्रति 10 ग्राम की कीमत पर बिक रहा है। इसी तरह कोलकाता में 24 कैरेट सोना 1,44,320 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना 1,32,290 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है। भोपाल में 24 कैरेट सोने की कीमत 1,44,370 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर है, जबकि 22 कैरेट सोना 1,32,340 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है।

जयपुर में 24 कैरेट सोना 1,44,470 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना 1,32,440 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है। पटना में 24 कैरेट सोने की कीमत 1,44,370 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर है, जबकि 22 कैरेट सोना 1,32,340 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है। लखनऊ के सर्राफा बाजार में 24 कैरेट सोना आज 1,44,470 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर और 22 कैरेट सोना 1,32,440 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है।

देश के अन्य राज्यों की तरह कर्नाटक, तेलंगाना और ओडिशा के सर्राफा बाजार में भी आज सोने के भाव में गिरावट दर्ज की गई है। इन तीनों राज्यों की राजधानियों बेंगलुरु, हैदराबाद और भुवनेश्वर में 24 कैरेट सोना 1,44,320 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है। इसी तरह इन तीनों शहरों के सर्राफा बाजारों में 22 कैरेट सोना 1,32,290 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है।

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