BUSINESS : एयरटेल-Vi को बड़ी राहत, बॉम्बे हाई कोर्ट ने रद्द किया एकमुश्त स्पेक्ट्रम चार्ज

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया को बड़ी राहत देते हुए सरकार के ‘वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज’ (OTSC) वाले आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है. अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए साफ कहा कि सरकार पुराने लाइसेंस की वित्तीय शर्तों को पिछली तारीख से नहीं बदल सकती. इस फैसले से टेलीकॉम कंपनियों पर लटक रही भारी-भरकम देनदारी का बड़ा संकट टल गया है.

टेलीकॉम सेक्टर की दिग्गज कंपनियों, भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया (Vi) को बॉम्बे हाई कोर्ट से एक बहुत बड़ी कानूनी तथा वित्तीय राहत मिली है. अदालत ने केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए ‘वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज’ (OTSC) को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. यानी इन कंपनियों के सिर पर कई सालों से लटक रही एक भारी-भरकम देनदारी की तलवार अब हट गई है.

कोर्ट ने अपने कड़े फैसले में साफ कर दिया है कि सरकार के पास यह अधिकार बिल्कुल नहीं है कि वह लाइसेंस जारी करने के बरसों बाद, पिछली तारीख (रेट्रोस्पेक्टिवली) से वित्तीय शर्तों में कोई मनमाना बदलाव करे. इस फैसले से न सिर्फ कंपनियों को अपनी जमा कराई गई बैंक गारंटी वापस मिलेगी, बल्कि टेलीकॉम सेक्टर में लंबे समय से छाई एक बड़ी अनिश्चितता भी खत्म हो जाएगी.

क्या है स्पेक्ट्रम विवाद
यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के चर्चित 2G स्पेक्ट्रम फैसले के बाद गरमाया था. उस समय दूरसंचार विभाग (DoT) ने एकतरफा फैसला लेते हुए तय किया कि जिन टेलीकॉम कंपनियों के पास जुलाई 2008 से 6.2 MHz से ज्यादा का स्पेक्ट्रम है, उनसे एक अतिरिक्त शुल्क वसूला जाएगा. सरकार का तर्क यह था कि कंपनियों को स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज के साथ-साथ स्पेक्ट्रम के आवंटन के लिए भी अलग से एकमुश्त रकम चुकानी चाहिए. इसके लिए सरकार ने 2012 में कंपनियों को डिमांड नोटिस भेज दिए थे, जिसे एयरटेल और वोडाफोन ने सीधे अदालत में चुनौती दी.

कंपनियों ने अदालत में दी मजबूत दलीलें
इस मामले में एयरटेल और वोडाफोन आइडिया का पक्ष बेहद स्पष्ट था. कंपनियों ने दलील दी कि भारतीय टेलीग्राफ एक्ट, 1885 या उनके किसी भी लाइसेंस समझौते में ऐसा कोई नियम नहीं है जो सरकार को पिछली तारीख से इस तरह का कोई भी अतिरिक्त चार्ज लगाने की शक्ति देता हो. इसके अलावा, कंपनियां नेशनल टेलीकॉम पॉलिसी (NTP) 1999 के तहत पहले से ही रेवेन्यू-शेयरिंग मॉडल का पालन कर रही थीं. इसका मतलब है कि जब भी उन्हें अतिरिक्त स्पेक्ट्रम दिया गया, उन्होंने उसी अनुपात में सरकार को अपना रेवेन्यू-शेयर भी बढ़ाकर चुकाया. ऐसे में यह नया वन-टाइम चार्ज पूरी तरह से अनुचित था.

बीच में नहीं बदल सकते नियम
बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की खंडपीठ ने कंपनियों के तर्कों को शत-प्रतिशत सही ठहराया. कोर्ट ने कहा कि टेलीकॉम लाइसेंस अपने आप में एक ‘कॉन्ट्रैक्ट’ (अनुबंध) है, और सरकार भी इसकी कानूनी शर्तों से पूरी तरह बंधी हुई है. अदालत ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘मैच शुरू होने के बाद खेल के नियम नहीं बदले जा सकते.’ सरकार ने इस चार्ज को ‘जनहित’ का नाम देने की कोशिश की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि केवल सरकारी खजाना भरना जनहित नहीं हो सकता. इसके लिए अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के 2016 के एयरसेल मामले के पुराने फैसले से भी अपनी स्पष्ट असहमति जताई.

आम उपभोक्ता के लिए इस फैसले के मायने
भले ही यह मामला सीधे तौर पर टेलीकॉम कंपनियों और सरकार के बीच का था, लेकिन इसका असर आम मोबाइल ग्राहकों पर भी पड़ता है. अदालत ने याद दिलाया कि 1999 की टेलीकॉम पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य आम लोगों को सस्ती टेलीकॉम सेवाएं देना और ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क कनेक्टिविटी सुधारना था. अब जब एयरटेल और वोडाफोन आइडिया के ऊपर से इस भारी जुर्माने का दबाव हट गया है, तो उनके पास भविष्य की तकनीक और नेटवर्क सुधारने के लिए अधिक पूंजी होगी. एयरटेल ने भी फैसले का स्वागत करते हुए स्पष्ट किया है कि इस कदम से सेक्टर में निवेश को भारी बढ़ावा मिलेगा, जिसका सीधा फायदा बेहतर नेटवर्क और सर्विस के रूप में ग्राहकों तक पहुंचेगा.

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