LIFESTYLE : मोबाइल की लत बना रही है ‘Smartphone Brain’ का शिकार! युवाओं में बढ़ रहे ये लक्षण

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एक्सपर्ट लगातार नोटिफिकेशन आना, बिना रुके सोशल मीडिया स्क्रॉल करना और एक ऐप से दूसरे ऐप पर जाना दिमाग को हर समय सक्रिय बनाए रखता है.

कुछ साल पहले तक न्यूरोलॉजिस्ट के पास जाने का मतलब स्ट्रोक, पार्किंसन, मिर्गी या डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़ा माना जाता था. ऐसे मरीजों में ज्यादातर बुजुर्ग होते थे और याददाश्त कमजोर होना या चलने-फिरने में परेशानी जैसी शिकायतें आम थीं. लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है. आजकल न्यूरोलॉजिस्ट के पास बड़ी संख्या में युवा और किशोर ऐसे लक्षणों के साथ पहुंच रहे हैं, जिनका संबंध लंबे समय तक स्मार्टफोन इस्तेमाल करने की आदत से जोड़ा जा रहा है. बार-बार सिरदर्द होना, ध्यान न लगना, नींद खराब होना, चक्कर आना, दिमाग में धुंधलापन महसूस होना और छोटी-छोटी बातें भूल जाना जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं.

काम, पढ़ाई और लोगों से जुड़ने का तरीका बदला

सीके बिड़ला हॉस्पिटल्स, सीएमआरआई के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. दीप दास के मुताबिक, मोबाइल फोन ने काम करने, पढ़ाई करने और लोगों से जुड़ने का तरीका बदल दिया है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा और बिना कंट्रोल के इस्तेमाल ध्यान लगाने की क्षमता, नींद, मूड और दिमाग की कार्यक्षमता पर असर डाल सकता है.एक्सपर्ट लगातार नोटिफिकेशन आना, बिना रुके सोशल मीडिया स्क्रॉल करना और एक ऐप से दूसरे ऐप पर जाना दिमाग को हर समय सक्रिय बनाए रखता है. धीरे-धीरे दिमाग को लगातार नए उत्तेजना की आदत पड़ जाती है और फिर किसी एक काम पर लंबे समय तक ध्यान लगाना मुश्किल होने लगता है. यही वजह है कि कई युवा अब किताब पढ़ने, मीटिंग में बैठने या पढ़ाई करने के दौरान भी बार-बार फोन देखने लगते हैं.

इन चीजों पर होता असर?

डॉक्टरों के अनुसार, स्मार्टफोन का असर सिर्फ ध्यान पर ही नहीं पड़ता, बल्कि नींद और याददाश्त पर भी दिखाई देता है. रात में देर तक फोन चलाने से आंखें ब्लू लाइट के संपर्क में रहती हैं, जिससे मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन कम हो जाता है. यही हार्मोन शरीर के सोने और जागने के चक्र को नियंत्रित करता है. जब नींद पूरी नहीं होती, तो एकाग्रता और याददाश्त प्रभावित होती है. इसके साथ ही चिंता, अवसाद और लंबे समय तक रहने वाले सिरदर्द की समस्या भी बढ़ सकती है.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

लंबे समय तक गर्दन झुकाकर मोबाइल देखने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर भी दबाव पड़ता है. इससे टेंशन हेडेक और माइग्रेन की समस्या बढ़ सकती है. इस स्थिति को ‘टेक्स्ट नेक’ कहा जाता है. इसके अलावा लगातार स्क्रीन देखने से डिजिटल थकान भी होने लगती है, जिससे व्यक्ति मानसिक रूप से थका हुआ, चिड़चिड़ा और काम में रुचि न लेने वाला महसूस कर सकता है. कई लोगों को लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने के बाद नई जानकारी समझने और याद रखने में भी परेशानी होने लगती है.

डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों और किशोरों पर इसका असर ज्यादा हो सकता है, क्योंकि उनका दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ होता. जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम उनकी पढ़ाई, नींद, शारीरिक गतिविधियों और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है.

एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि समस्या स्मार्टफोन नहीं, बल्कि उसका गलत इस्तेमाल है. वे 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं। यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए करीब 20 फीट दूर किसी चीज को देखें. इसके अलावा स्क्रीन से नियमित ब्रेक लें, सोने से कम से कम एक घंटे पहले फोन का इस्तेमाल बंद करें, सही तरीके से बैठें, नियमित व्यायाम करें और रोज कुछ समय खुली हवा में बिताएं.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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