NATIONAL : खाड़ी देशों में तनाव का प्याज किसानों पर सीधा असर, निर्यात में गिरावट; घरेलू मांग कमजोर

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खाड़ी देशों में तनाव ने भारत के प्याज बाजार का संतुलन बिगाड़ दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग घटने, शि¨पग महंगा होने और घरेलू बाजार में मांग कमजोर रहने से प्याज की कीमतों पर भारी दबाव बन गया है।स्थिति ऐसी हो गई है कि किसानों को लागत से भी आधी कीमत पर प्याज बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। हालात पर जल्दी नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका असर खेती के पैटर्न पर भी पड़ सकता है और किसान प्याज की खेती से दूरी बना सकते हैं।

हालांकि सरकार ने स्थिति संभालने के लिए नेफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियों को बाजार से प्याज खरीदकर बफर स्टाक बनाने के निर्देश दिए हैं। भारत दुनिया के बड़े प्याज निर्यातकों में शामिल है और कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों जैसे यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, इराक और ओमान आदि देशों में जाता है।

मगर पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, खासकर अमेरिका, इजरायल और ईरान से जुड़ा तनाव बढ़ने के बाद इन देशों की व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। परिणाम है कि प्याज निर्यात में करीब 30 प्रतिशत तक गिरावट आई है। खाड़ी देशों को होने वाले निर्यात में तो 55-60 प्रतिशत तक कमी आ गई है।

इसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ा है। जो प्याज पहले विदेश जाता था, वह अब घरेलू बाजार में ही ग्राहकों का इंतजार कर रहा है। इससे सप्लाई अचानक बढ़ गई है, किंतु मांग उतनी नहीं बढ़ी। थोक बाजारों में कई शहरों में प्याज 800 से 1000 रुपये प्रति ¨क्वटल तक बिक रहा है, जबकि उत्पादन लागत 1800 से 2200 रुपये प्रति क्विंटल के बीच है।

हार्टिकल्चर प्रोड्यूस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विकास सिंह का कहना है कि बढ़ते शिपिंग खर्च ने स्थिति को और खराब कर दिया है। कुछ महीने पहले तक जहां एक कंटेनर का भाड़ा 500-800 डालर के बीच था, वह अब बढ़कर 6000-7500 डालर तक पहुंच गया है।

व्यापारियों के लिए घाटे का सौदा बना निर्यात
ऐसे में निर्यात करना व्यापारियों के लिए घाटे का सौदा बन गया है। नतीजा है कि निर्यातक पीछे हट रहे हैं और इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ा है। खाड़ी संकट से घरेलू मांग में भी कमजोरी आई है। होटल-रेस्टोरेंट सेक्टर की धीमी रफ्तार और एलपीजी आपूर्ति में अनियमितता के कारण खपत पर असर पड़ा है।

इसके अलावा बांग्लादेश जैसे पारंपरिक खरीदारों ने भी पिछले दो सालों में अपनी खरीद घटा दी है, जिससे मांग और कमजोर हुई है। हालांकि इस साल उत्पादन में कुछ कमी का अनुमान है। राष्ट्रीय स्तर पर करीब 10-11 प्रतिशत गिरावट आई है, लेकिन निर्यात घटने के कारण देश में प्याज की उपलब्धता पर्याप्त बनी हुई है। यानी उत्पादन कम होने के बावजूद कीमतें इसलिए नहीं बढ़ रहीं, क्योंकि माल देश के भीतर ही ज्यादा मात्रा में मौजूद है।

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