सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने रविवार को एसआईआर प्रक्रिया पर विवाद की ओर इशारा करते हुए कहा कि वोटिंग अधिकार को कोई छीन नहीं सकता. ऊपर दी गई तस्वीर अक्तूबर 2025 की है जब जस्टिस भुइयां ऑल असम जजेज़ एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में बोल रहे थे. (फ़ाइल फ़ोटो) इमेज
इमेज कैप्शन,सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने रविवार को एसआईआर प्रक्रिया पर विवाद की ओर इशारा करते हुए कहा कि वोटिंग अधिकार को कोई छीन नहीं सकता. ऊपर दी गई तस्वीर अक्तूबर 2025 की है जब जस्टिस भुइयां ऑल असम जजेज़ एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में बोल रहे थे.
वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण ( एसआईआर) को लेकर चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के जज उज्जल भुइयां ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत मिले वोटिंग के अधिकार से कोई भी छेड़छाड़ नहीं कर सकता.
जस्टिस भुइयां रविवार को हैदराबाद की नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोल रहे थे.

इस दौरान उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया जो ‘बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दे और वे बगैर वोट देने के अधिकार वाले नागरिक बन जाएं, संविधान का उल्लंघन होगी.’
उन्होंने कहा कि इसे सही ठहराने के लिए दूसरे मामलों का हवाला देना भी उचित नहीं ठहराया जा सकता.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि किसी भारतीय नागरिक को उसके मतदान के अधिकार से वंचित करना ‘शरीर से आत्मा निकालने’ जैसा होगा.
उनकी ये टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश भर के कई राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं. विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर सही ढंग से नहीं हो रहा है और इसके ज़रिये करोड़ों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं.
पिछले सप्ताह अग्रेज़ी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक खोजी रिपोर्ट में कहा गया था कि एसआईआर को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद रहे हैं.
क़ानूनी ख़बरों और विश्लेषण की वेबसाइट बार एंड बेंच के मुताबिक़ हैदराबाद के कार्यक्रम में जस्टिस भुइयां ने कहा, ”अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और अपने ही देश में उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया जाता है, यानी ऐसा नागरिक जिसके पास वोट देने का अधिकार नहीं है, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी है. दूसरे मामलों का हवाला देकर इसे किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता.”
उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 325 कहता है कि लोकसभा या किसी राज्य की विधानसभा के चुनाव के लिए हर क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र की एक सामान्य मतदाता सूची होगी. किसी व्यक्ति को केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या इनमें से किसी एक के आधार पर उस सूची में शामिल होने से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.
उन्होंने कहा, ”संविधान के अनुच्छेद 326 के मुताबिक, लोकसभा और हर राज्य की विधानसभा के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे. यानी भारत का हर नागरिक, जिसकी उम्र 18 साल या उससे अधिक है (28 मार्च 1989 से पहले यह उम्र 21 साल थी) और जो संविधान या संबंधित कानून के तहत गैर-निवास, मानसिक अस्वस्थता, अपराध या भ्रष्ट अथवा अवैध आचरण के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया गया हो, ऐसे चुनाव में मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड होने का हकदार होगा.”
डॉ. बीआर आंबेडकर का हवाला देते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को सही ठहराते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि चूंकि हमने एक ऐसा अहम फ़ैसला लिया है, जो अतीत को लगभग पूरी तरह बदल देता है, इसलिए संविधान में स्पष्ट रूप से यह बताया जाना बेहतर है कि यही वह आधार है जिसके कारण ड्राफ़्ट संविधान में अनुच्छेद 289ए और 289बी शामिल किए गए, जो अब संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 हैं.”


