महाराष्ट्र FDA ने बेबी फूड के प्रचार और पैकेजिंग के नियम सख्त किए हैं. पैकेट पर ‘Mother’s Milk Is Best’ संदेश जरूरी होगा और नियम तोड़ने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.
महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने बेबी फूड को लेकर नियम और सख्त कर दिए हैं. FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने साफ कहा है कि ऐसे प्रोडक्ट्स के प्रचार, पैकेजिंग और बिक्री में नियमों का पालन करना जरूरी है. नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. नए निर्देशों के तहत बेबी फूड के पैकेट पर ‘Mother’s Milk Is Best’ यानी ‘मां का दूध सर्वोत्तम है’ का संदेश देना जरूरी होगा.
इसका मकसद यह साफ करना है कि शिशुओं के लिए मां का दूध सबसे महत्वपूर्ण है और किसी भी प्रोडक्ट को मां के दूध से बेहतर बताकर प्रचारित नहीं किया जा सकता. FDA के मुताबिक, शिशु दूध के विकल्प, शिशु आहार और फीडिंग बोतलों से जुड़े विज्ञापन पर IMS Act, 1992 के तहत कई तरह की पाबंदियां हैं.
टीवी से सोशल मीडिया तक प्रचार पर रोक
इन प्रोडक्ट्स का प्रचार किसी भी माध्यम से नहीं किया जा सकता. टीवी, प्रिंट मीडिया, आउटडोर विज्ञापन, वेबसाइट, सर्च विज्ञापन और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी नियम लागू होंगे. सोशल मीडिया, इन्फ्लुएंसर्स और मैसेजिंग ऐप्स के जरिए होने वाले प्रचार पर भी नजर रहेगी. जरूरी चेतावनी और जानकारी के बिना ऐसे प्रोडक्ट्स का प्रमोशन नहीं किया जा सकता.

कंपनियां अपने प्रोडक्ट को मां के दूध के बराबर या उससे बेहतर बताकर भी प्रचार नहीं कर सकतीं. इसके अलावा मुफ्त सैंपल, गिफ्ट, कूपन या किसी तरह का लालच देकर इन प्रोडक्ट्स को बढ़ावा देने पर भी रोक है.
नियमों के तहत कंपनियां अपने प्रोडक्ट के प्रचार के लिए गर्भवती महिलाओं या माताओं से किसी भी तरह का संपर्क नहीं कर सकतीं. FDA का कहना है कि ऐसे मामलों में IMS Act, 1992 और Infant Nutrition Regulations, 2020 का पालन जरूरी है. FDA को नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामले सामने आने के बाद यह सख्ती की जा रही है.
डॉक्टर और अस्पताल भी नहीं कर सकेंगे प्रचार
FDA ने डॉक्टरों और अस्पतालों को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं. किसी डॉक्टर, अस्पताल या मेडिकल एसोसिएशन का इस्तेमाल इन प्रोडक्ट्स के प्रचार के लिए नहीं किया जा सकता.
IMS Act की धारा 9 के तहत निर्माता या वितरक किसी स्वास्थ्यकर्मी को आर्थिक फायदा या गिफ्ट नहीं दे सकते. सेमिनार, बैठक, कॉन्फ्रेंस, शैक्षणिक कार्यक्रम, रिसर्च, फेलोशिप या स्पॉन्सरशिप के नाम पर भी इस तरह का आर्थिक लाभ देने पर रोक है.
CME और CPD जैसे कार्यक्रम भी इन नियमों के दायरे में आएंगे. ऐसे कार्यक्रमों में स्टॉल, बैनर, सब-सेशन या वैज्ञानिक प्रस्तुतियों के जरिए भी इन प्रोडक्ट्स का प्रचार नहीं किया जा सकता.
पैकेट पर हर पोषक तत्व की जानकारी जरूरी
बेबी फूड की पैकेजिंग को लेकर भी FDA ने नियमों पर जोर दिया है. प्रोडक्ट के पैकेट, डिब्बे या बोतल पर उसमें मौजूद सामग्री और पोषक तत्वों की पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से लिखी होनी चाहिए.
इसमें ऊर्जा, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और मिनरल्स समेत दूसरे पोषक तत्वों की जानकारी शामिल है. इसके अलावा प्रिजर्वेटिव, रंग, फ्लेवरिंग एजेंट और दूसरी मिलाई गई सामग्री का विवरण भी देना होगा.
‘शुगर फ्री’ लिखा है तो नियमों का पालन जरूरी
FDA ने चीनी को लेकर भी नियमों का पालन करने की बात कही है. कुल कार्बोहाइड्रेट में सुक्रोस या फ्रुक्टोज की मात्रा तय सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए. दी गई जानकारी के मुताबिक यह सीमा 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए.
अगर पैकेट पर ‘No Added Sugar’ या ‘Sugar Free’ लिखा है तो उसमें वास्तव में अतिरिक्त चीनी नहीं होनी चाहिए. पैकेज पर दी गई जानकारी भी सही और स्पष्ट होनी जरूरी है.
FDA की कार्रवाई सिर्फ निर्माता तक सीमित नहीं रहेगी. जांच में यह भी देखा जाएगा कि प्रोडक्ट के लिए कच्चा माल कहां से आया, इसे किसने बनाया, इसकी मार्केटिंग कौन कर रहा है, इसे कहां स्टोर किया गया और किन अस्पतालों, डॉक्टरों या मेडिकल स्टोर पर यह उपलब्ध है. जहां भी नियमों का उल्लंघन मिलेगा, वहां कार्रवाई की जाएगी.
IAP और IMA जैसी संस्थाओं के साथ होगी बैठक
FDA के निर्देश स्वास्थ्य विभाग और मेडिकल एजुकेशन विभाग को भी भेजे गए हैं. आने वाले समय में इंडियन अकादमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और अस्पतालों से जुड़ी एसोसिएशनों के साथ बैठक की जाएगी. इन संस्थाओं को भी नियमों के पालन और जागरूकता अभियान में शामिल किया जाएगा.
FDA के मुताबिक, बेबी फूड से जुड़े कारोबार में FSSAI के नियमों के साथ IMS Act का पालन भी जरूरी है. रजिस्ट्रेशन, मैन्युफैक्चरिंग, स्टोरेज और बिक्री से जुड़े सभी नियमों का पालन करना होगा.
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नियमों के उल्लंघन पर FSSAI Act के तहत कार्रवाई हो सकती है. भ्रामक विज्ञापन के मामले में 10 लाख रुपये तक, बिना लाइसेंस या संबंधित उल्लंघनों में 5 लाख रुपये तक और मिसब्रांडिंग के मामलों में 3 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.
अगर कोई प्रोडक्ट असुरक्षित पाया जाता है तो कानून के तहत गंभीर सजा का भी प्रावधान है. शिकायत के लिए संबंधित पोर्टल और टोल-फ्री नंबर का इस्तेमाल किया जा सकता है.

