NATIONAL : ‘लोकतंत्र की साख को खत्म करने का प्रयास’, संसद में विपक्ष के हंगामे पर बोले राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश

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राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के लगातार हंगामे और नारेबाजी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही बाधित करना लोकतंत्र की नींव और संसदीय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रहार है.राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण ने संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के लगातार हंगामे और नारेबाजी पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही में बार-बार व्यवधान डालना देश में लोकतंत्र की नींव पर बड़ा प्रहार है। उन्होंने कहा, इससे संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर करने की कोशिश होती है।

ANI को दिए एक इंटरव्यू में हरिवंश ने कहा कि संसद में बार-बार संविधान का जिक्र किया जाता है और उसकी प्रतियां लेकर प्रदर्शन किए जाते हैं। हम संविधान की पुस्तके लेकर घूमते हैं मगर हमारा आचरण कैसा है? मैं किसी व्यक्ति विशेष के बारे में नहीं कह रहा हूं। आज हजारों की संख्या में लोग संविधान की किताब लेकर घूमते हैं। संविधान पर चर्चा के दौरान करीब 2400 संशोधन पेश किए गए थे।’

‘संसद के कामकाज में अवरोध पैदा करने वाले के खिलाफ गुस्सा’
उन्होंने आगे कहा, ‘जो लोग संसद के कामकाज में अवरोध पैदा करते हैं उनके प्रति मेरा गुस्सा है। संसद की कल्पना हमारे लिए लोकतंत्र के मंदिर की तरह है। हमारी सत्ता में लोग आते-जाते रहते हैं और यह लोकतंत्र की खूबसूरती है मगर हमें संकट में एक होकर भारत को बचाना है। दुनिया भर की भू-राजनीति को देखते हुए हमें मिलकर काम करना चाहिए। हमारी पीढ़ी को पूछना चाहिए कि आखिर क्यों हमने 2014 के बाद विकसित भारत का सपना देखा था।’

‘पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी’
हरिवंश ने कहा, ‘जिम्मेदारी सरकार और विपक्ष की बराबर है। अगर एक पक्ष भी कार्यवाही रोकने के लिए दृढ़ हो जाए तो सदन में वही स्थिति देखने को मिलती है, जो हमने हाल में देखी।’

उन्होंने कहा कि वह यह बात राज्यसभा के उपसभापति के तौर पर नहीं, बल्कि देश के एक चिंतित नागरिक के रूप में कह रहे हैं। उन्होंने अपने लंबे पत्रकारिता अनुभव, जेपी आंदोलन से जुड़ाव और पिछले 12 वर्षों से सांसद के रूप में अपने अनुभव का भी जिक्र किया।

‘लोकतंत्र की साख को खत्म करने का प्रयास’
संसद के मानसून सत्र 2026 पर उपसभापति हरिवंश नारायण ने कहा, ‘आज मैं आपसे इस देश के चिंतित नागरिक के रूप में बात कर रहा हूं। मैं पिछले 12 वर्षों से सांसद हूं, पर मैं आज एक नागरिक दर्शक के रूप में बात करना चाहता हूं। इस सत्र पर यदि मुझे टिप्पणी करनी हो तो मैं कहना चाहूंगा कि इस सत्र में कामकाज कितने हुए उसे घोषित आंकड़े बता रहे हैं लेकिन संसदीय लोकतंत्र की साख को खत्म करने, इसे अविश्वसनीय और विफल बनाने, जन प्रतिनिधियों के प्रति समाज में, लोकमानस में अनास्था पैदा करने बल्कि मैं कहूं तो संसदीय लोकतंत्र को खत्म करने की दिशा में इस तरह का प्रयास किया गया है।

उन्होंने आगे कहा, ‘इस देश में संसदीय लोकतंत्र से बेहतर मंच नहीं हो सकता। अब फैसला संसद में नहीं हो रहे, सड़कों पर हो, ये बौद्धिक विमर्श अगर इस देश में चले और संसद में भी इस तरह का अवरोध दिखाई दे तो मेरे जैसे इस देश के करोड़ों नागरिकों के लिए इससे अधिक चिंता की बात नहीं हो सकती।

हरिवंश नारायण ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को कोट करते हुए कहा, ‘पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1958 में राज्यसभा के सदस्यों को क्या कहा था ये मैं आज आपको बताना चाहूंगा। उन्होंने कहा कि संसद की गरिमा और अनुशासन, संसद देश के बाकी हिस्सों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करता है। हमारी तरफ लाखों-करोड़ों निगाहें लगी हैं, उन निगाहों को रास्ता दिखाने का काम हमारा है। क्या हम उस पर खरे उतरे, क्या हम उसमें सफल हुए? मैं इस पीड़ा के कारण ये बात कह रहा हूं जो लोकतंत्र की साख पर सीधा प्रहार था। संसद चलाने का सामान्य दायित्व सरकार का भी है और विपक्ष का भी है लेकिन एक भी पक्ष यदि तैयार हो कि हम इसे चलने नहीं देंगे तो ऐसा ही दृश्य होगा जिसे हम देख रहे हैं।’

पेपर लीक के मुद्दे पर क्या बोले?
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण ने देश के कई राज्यों में पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर हो रहे छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर कहा, ‘पेपर लीक का यह मुद्दा 25, 30 या 40 सालों से चला आ रहा है। उत्तर प्रदेश में एक सरकार इसलिए गिर गई थी क्योंकि उसने परीक्षाओं में नकल रोकने की कोशिश की थी। मौजूदा रक्षा मंत्री उस समय वहां मंत्री थे। ऐसा क्यों है कि समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में अब एक समिति बनाई गई है? 1960 के दशक में ऐसा क्यों नहीं किया गया, जब सिस्टम की कमियां साफ दिखने लगी थीं?।’

उन्होंने कहा, ‘मैं छात्रों से अपील करता हूं कि वे सिर्फ शिक्षा से आगे बढ़कर सोचें और राज्यों में गवर्नेंस (शासन-व्यवस्था) में भी इसी तरह के सिस्टम से जुड़े सुधारों की जरूरत पर विचार करें। हर किसी ने छात्र आंदोलन के पीछे के दर्द को समझा, और मैं सरकार की संवेदनशीलता की तारीफ करता हूं। उन्होंने तुरंत सभी मांगें मान लीं, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूं।’राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के लगातार हंगामे और नारेबाजी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही बाधित करना लोकतंत्र की नींव और संसदीय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रहार है।

नई दिल्ली: राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण ने संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के लगातार हंगामे और नारेबाजी पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही में बार-बार व्यवधान डालना देश में लोकतंत्र की नींव पर बड़ा प्रहार है। उन्होंने कहा, इससे संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर करने की कोशिश होती है।

ANI को दिए एक इंटरव्यू में हरिवंश ने कहा कि संसद में बार-बार संविधान का जिक्र किया जाता है और उसकी प्रतियां लेकर प्रदर्शन किए जाते हैं। हम संविधान की पुस्तके लेकर घूमते हैं मगर हमारा आचरण कैसा है? मैं किसी व्यक्ति विशेष के बारे में नहीं कह रहा हूं। आज हजारों की संख्या में लोग संविधान की किताब लेकर घूमते हैं। संविधान पर चर्चा के दौरान करीब 2400 संशोधन पेश किए गए थे।’

‘संसद के कामकाज में अवरोध पैदा करने वाले के खिलाफ गुस्सा’
उन्होंने आगे कहा, ‘जो लोग संसद के कामकाज में अवरोध पैदा करते हैं उनके प्रति मेरा गुस्सा है। संसद की कल्पना हमारे लिए लोकतंत्र के मंदिर की तरह है। हमारी सत्ता में लोग आते-जाते रहते हैं और यह लोकतंत्र की खूबसूरती है मगर हमें संकट में एक होकर भारत को बचाना है। दुनिया भर की भू-राजनीति को देखते हुए हमें मिलकर काम करना चाहिए। हमारी पीढ़ी को पूछना चाहिए कि आखिर क्यों हमने 2014 के बाद विकसित भारत का सपना देखा था।’

‘पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी’
हरिवंश ने कहा, ‘जिम्मेदारी सरकार और विपक्ष की बराबर है। अगर एक पक्ष भी कार्यवाही रोकने के लिए दृढ़ हो जाए तो सदन में वही स्थिति देखने को मिलती है, जो हमने हाल में देखी।’

उन्होंने कहा कि वह यह बात राज्यसभा के उपसभापति के तौर पर नहीं, बल्कि देश के एक चिंतित नागरिक के रूप में कह रहे हैं। उन्होंने अपने लंबे पत्रकारिता अनुभव, जेपी आंदोलन से जुड़ाव और पिछले 12 वर्षों से सांसद के रूप में अपने अनुभव का भी जिक्र किया।

‘लोकतंत्र की साख को खत्म करने का प्रयास’
संसद के मानसून सत्र 2026 पर उपसभापति हरिवंश नारायण ने कहा, ‘आज मैं आपसे इस देश के चिंतित नागरिक के रूप में बात कर रहा हूं। मैं पिछले 12 वर्षों से सांसद हूं, पर मैं आज एक नागरिक दर्शक के रूप में बात करना चाहता हूं। इस सत्र पर यदि मुझे टिप्पणी करनी हो तो मैं कहना चाहूंगा कि इस सत्र में कामकाज कितने हुए उसे घोषित आंकड़े बता रहे हैं लेकिन संसदीय लोकतंत्र की साख को खत्म करने, इसे अविश्वसनीय और विफल बनाने, जन प्रतिनिधियों के प्रति समाज में, लोकमानस में अनास्था पैदा करने बल्कि मैं कहूं तो संसदीय लोकतंत्र को खत्म करने की दिशा में इस तरह का प्रयास किया गया है।

उन्होंने आगे कहा, ‘इस देश में संसदीय लोकतंत्र से बेहतर मंच नहीं हो सकता। अब फैसला संसद में नहीं हो रहे, सड़कों पर हो, ये बौद्धिक विमर्श अगर इस देश में चले और संसद में भी इस तरह का अवरोध दिखाई दे तो मेरे जैसे इस देश के करोड़ों नागरिकों के लिए इससे अधिक चिंता की बात नहीं हो सकती।

हरिवंश नारायण ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को कोट करते हुए कहा, ‘पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1958 में राज्यसभा के सदस्यों को क्या कहा था ये मैं आज आपको बताना चाहूंगा। उन्होंने कहा कि संसद की गरिमा और अनुशासन, संसद देश के बाकी हिस्सों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करता है। हमारी तरफ लाखों-करोड़ों निगाहें लगी हैं, उन निगाहों को रास्ता दिखाने का काम हमारा है। क्या हम उस पर खरे उतरे, क्या हम उसमें सफल हुए? मैं इस पीड़ा के कारण ये बात कह रहा हूं जो लोकतंत्र की साख पर सीधा प्रहार था। संसद चलाने का सामान्य दायित्व सरकार का भी है और विपक्ष का भी है लेकिन एक भी पक्ष यदि तैयार हो कि हम इसे चलने नहीं देंगे तो ऐसा ही दृश्य होगा जिसे हम देख रहे हैं।’

पेपर लीक के मुद्दे पर क्या बोले?
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण ने देश के कई राज्यों में पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर हो रहे छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर कहा, ‘पेपर लीक का यह मुद्दा 25, 30 या 40 सालों से चला आ रहा है। उत्तर प्रदेश में एक सरकार इसलिए गिर गई थी क्योंकि उसने परीक्षाओं में नकल रोकने की कोशिश की थी। मौजूदा रक्षा मंत्री उस समय वहां मंत्री थे। ऐसा क्यों है कि समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में अब एक समिति बनाई गई है? 1960 के दशक में ऐसा क्यों नहीं किया गया, जब सिस्टम की कमियां साफ दिखने लगी थीं?।’

उन्होंने कहा, ‘मैं छात्रों से अपील करता हूं कि वे सिर्फ शिक्षा से आगे बढ़कर सोचें और राज्यों में गवर्नेंस (शासन-व्यवस्था) में भी इसी तरह के सिस्टम से जुड़े सुधारों की जरूरत पर विचार करें। हर किसी ने छात्र आंदोलन के पीछे के दर्द को समझा, और मैं सरकार की संवेदनशीलता की तारीफ करता हूं। उन्होंने तुरंत सभी मांगें मान लीं, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूं।’

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