हिंदुकुश-हिमालय क्षेत्र में तापमान दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है. नए शोध के मुताबिक सदी के अंत तक करोड़ों लोगों के पानी पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है. हिमालय को अक्सर एशिया का जल टॉवर कहा जाता है. यही पर्वत श्रृंखला करोड़ों लोगों के लिए पानी का सबसे बड़ा स्रोत है. वैज्ञानिक इसे “तीसरा ध्रुव” भी कहते हैं क्योंकि यहां दुनिया के ध्रुवीय इलाकों के बाद सबसे ज्यादा बर्फ और ग्लेशियर मौजूद हैं. लेकिन अब यही हिमालय तेजी से बदलते मौसम और बढ़ते तापमान की वजह से गंभीर खतरे में है.
मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विश्वंभर प्रसाद सती और सुरजीत बनर्जी के एक ताजा शोध ने इस खतरे की गंभीरता को उजागर किया है. अंतरराष्ट्रीय जर्नल अर्थ साइंस रिव्यूज में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक हिंदुकुश-हिमालय क्षेत्र में तापमान दुनिया के औसत तापमान से लगभग दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर यह सिलसिला जारी रहा तो इस सदी के अंत तक हिमालय की लगभग 68 प्रतिशत बर्फ हमेशा के लिए गायब हो सकती है.
शोध के मुताबिक हिमालय में बदलाव की शुरुआत पिछले चार दशकों में तेजी से दिखाई देने लगी है. 1980 से 2020 के बीच हिंदुकुश-हिमालय क्षेत्र का तापमान प्रति दशक औसतन 0.2 से 0.3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है. यह बढ़ोतरी वैश्विक औसत से करीब दोगुनी मानी जा रही है. वैज्ञानिकों ने पाया कि पूर्वी हिमालय के इलाकों में तापमान बढ़ने की रफ्तार और भी ज्यादा है. इसके साथ ही बारिश के पैटर्न में भी बड़ा बदलाव आया है. कहीं अत्यधिक बारिश हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है. इन बदलावों का सीधा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है. कई ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और बर्फ की परत हर साल पतली होती जा रही है.

शोध में भविष्य को लेकर बेहद चिंताजनक अनुमान भी सामने आया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो वर्ष 2100 तक हिमालय का करीब 68 प्रतिशत हिमावरण समाप्त हो सकता है.
काराकोरम क्षेत्र, जिसे अभी तक अपेक्षाकृत स्थिर माना जाता था, वहां भी करीब 26 प्रतिशत बर्फीला आवरण खत्म होने की आशंका जताई गई है. इसका मतलब यह है कि आने वाले दशकों में हिमालय का स्वरूप ही बदल सकता है. यह सिर्फ पहाड़ों की खूबसूरती का सवाल नहीं है. हिमालय की बर्फ एशिया की कई बड़ी नदियों के लिए जीवनरेखा है. अगर बर्फ कम हुई तो इन नदियों का जल प्रवाह भी प्रभावित होगा. हिमालय से निकलने वाली सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, तारिम और अमू दरिया जैसी बड़ी नदियां करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं. इन नदियों के सालाना प्रवाह का लगभग 33 से 42 प्रतिशत हिस्सा ग्लेशियरों और हिमावरण के पिघलने से आता है.
अध्ययन के अनुसार इन नदियों पर करीब 86.9 करोड़ लोग सीधे तौर पर निर्भर हैं. अभी ग्लेशियर तेजी से पिघलने के कारण कुछ जगहों पर नदियों में पानी बढ़ता हुआ दिख रहा है. मानसून से पहले ही पानी का बहाव तेज हो जाता है और कई बार बाढ़ का खतरा पैदा हो जाता है.
लेकिन वैज्ञानिक इसे राहत नहीं, बल्कि आने वाले संकट की चेतावनी मानते हैं. जब ग्लेशियर ही खत्म हो जाएंगे तो नदियों में पानी का स्थायी स्रोत खत्म हो जाएगा. तब कई नदियां मौसमी बन सकती हैं और इससे पानी, खेती और बिजली उत्पादन पर गहरा असर पड़ेगा. बढ़ते तापमान की वजह से हिमालय में एक और खतरा तेजी से बढ़ रहा है. ग्लेशियरों के पिघलने से बड़ी-बड़ी हिमनदीय झीलें बन रही हैं. इन झीलों के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ कहा जाता है.

ऐसी बाढ़ बिना चेतावनी के आती है और कुछ ही मिनटों में भारी तबाही मचा सकती है. उत्तराखंड समेत कई हिमालयी राज्यों में इसके उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं. इसके अलावा पर्माफ्रॉस्ट यानी जमीन के अंदर जमी रहने वाली बर्फीली परत भी पिघलने लगी है. शोध के मुताबिक यह परत हर साल 2 से 23 सेंटीमीटर तक गहरी पिघल रही है. इससे पहाड़ी ढलानों की मजबूती कमजोर पड़ रही है और भूस्खलन तथा जमीन धंसने की घटनाएं बढ़ रही हैं.
शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो हिंदुकुश-हिमालय क्षेत्र की पूरी जल प्रणाली अस्थिर हो सकती है. इसका असर सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहेगा. भारत, पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बांग्लादेश जैसे कई देश इससे प्रभावित होंगे. वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर तुरंत और ठोस कदम उठाने की जरूरत है. हिमालय सदियों से एशिया की जीवनरेखा रहा है, लेकिन अब उसकी बर्फ तेजी से पिघल रही है और यह पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है.
















